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Saturday, 24 November 2018

November 24, 2018

समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System)

समेकित कृषि प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है। जिसमें फसल उत्पादन, मवेशी पालन, फल सब्जी उत्पादन, मछली पालन और वानिकी का इस प्रकार समायोजन किया जाता है। जिससे कि वे एक दूसरे के पूरक बन सके। इस प्रणाली के अंतर्गत पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए संसाधनों की क्षमता, उत्पादकता और लाभ प्रदता में वृद्धि की जा सके। इससे कृषि लागत में कमी आने के साथ उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। इस प्रणाली के तीन मुख्य भाग हैं। इनमें मत्स्य आधारित समन्वित कृषि प्रणाली, फसल आधारित समन्वित कृषि प्रणाली और पशुधन आधारित समन्वित कृषि प्रणाली शामिल है।

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Tuesday, 9 October 2018

October 09, 2018

सब्जी उत्पादन में कीट नियंत्रण

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के तरीकों की सफलता मुख्यतया हानिकारक कीट एवं मित्र कीटों की निगरानी के आधार पर कीट प्रबंधन के विभिन्न घटकों के एकीकरण कर सही निर्णय को लागू करने के ऊपर निर्भर है।

फसल चक्रअपनाकर कीट नियंत्रण-

किसी भी खेत में सब्जियों को लगाते समय उचित फसल-चक्र अपनाना चाहिए जिससे एक ही कुल की सब्जी को पुन: नहीं लगाना चाहिए। इस विधि से निरन्तर जीवन चक्र , अपेक्षाकृत संख्या एवं क्षति स्तर कम किया जा सकता है।

बुवाई व पौध रोपण के समय में परिवर्तन करके-

कीटों के प्रति फसल की मुलायम अवस्था को ध्यान में रखकर फसल की बुवाई तथा रोपाई के समय में परिवर्तन करके अधिक हानि से बचाया जा सकता है। सब्जियों की बुवाई व रोपाई के समय में परिवर्तन कर लाल भृंग कीट, फल मक्खी, तना एवं फल छेदक कीट के प्रकोप को कम किया जा सकता है। पौधों की बुवाई व रोपाई ऐसे समय में करना चाहिए, जब पौधों की नाजुक अवस्थाएं एवं हानिकारक कीटों की निष्क्रिय अवस्थाएं समानान्तर हों।

सस्य क्रियाओं द्वारा कीट प्रबंधन-

कीट प्रबंधन में इस घटक के ऊपर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता है, साथ ही यह पर्यावरण को सुरक्षित व अधिक टिकाऊ बनाता है। सस्य क्रियाओं का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे नाशीकीटों के ऊपर एकीकृत एवं मित्र कीटों के ऊपर अनुकूल प्रभाव पड़े। इसके अन्तर्गत उचित किस्मों का चयन, बुवाई एवं रोपाई के समय में परिवर्तन, कीट-प्रपंच, फसल चक्र एवं अंत: फसलों का सही चुनाव आदि शामिल है।

अवरोधी एवं सहनशील किस्मों का उपयोग-

किसी क्षेत्र के नाशीकीट एवं मित्र कीटों की विविधता एवं सघनता के आधार पर अवरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव समन्वित कीट प्रबंधन की महत्वपूर्ण कड़ी है। इस प्रकार चयनित किस्मों में अपेक्षाकृत कीटों का प्रकोप कम होता है तथा रासायनिक दवाओं के उपयोग में भी कमी आती है। यह विधि सबसे सरल, सस्ती व दुष्प्रभाव रहित है।


ग्रीष्मकालीन जुताई-

गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करके सुषुप्ता अवस्था में पड़े कीड़ों को नष्ट करना एक प्रभावी नियंत्रण विधि है। फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करके फल मक्खी, कद्दू का लाल भृंग तथा कटुआ कीट के जीवन चक्र को नष्ट कर उनकी सक्रियता को कम किया जा सकता है।

अन्त: फसलीकरण-

सब्जियों की फसल के बीच में अन्त: फसलीकरण की क्रिया के द्वारा भी कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है। अन्त: फसलीकरण में लगाए गए भिन्न-भिन्न प्रकृति के पौधों द्वारा छोड़े जाने वाले जैव रसायन से कीटों के प्रौढ़ दूर भागते हैं तथा उनके द्वारा अण्डा देने की क्रिया भी कम हो जाती है। इस प्रकार के पौध रोपण प्रक्रिया से परभक्षी एवं परजीवी कीटों की क्रियाशीलता को बढ़ाती है। टमाटर एवं गोभी की अन्त: फसलीकरण से इन दोनों सब्जियों में कीट अकेले की अपेक्षा कम लगते हैं।

कीटों को आकर्षित करने वाली फसलों का उपयोग-

मुख्य फसल के साथ ऐसी फसलों को लगाना चाहिए, जिनको कीट मुख्य फसल की अपेक्षा अधिक पसंद करते हैं। आकर्षित करने वाली फसलों को मुख्य फसल में लगाकर बिना किसी रसायन के प्रयोग से मुख्य फसल को आसानी से कम लागत में उगाया जा सकता है। क्योंकि मुख्य फसल पर लगने वाले कीड़े आकर्षक फसलों पर आ जाते हैं, जिनको आसानी से नष्ट किया जा सकता है। गोभीवर्गीय फसलों को हरी सूड़ी एवं पर्ण जालक कीट के नियंत्रण के लिए सरसों का तथा टमाटर में लगने वाली फल छेदक कीट के रोकथाम के लिए गेंदे के फसल को आकर्षक फसल के रूप में प्रयोग करना चाहिए।

सब्जी में जैविक विधि से कीट नियंत्रण-]

समन्वित कीट प्रबंधन में जैविक नियंत्रण एक प्रमुख घटक है। किसी भी परिस्थिति में मित्र कीट एवं अन्य सूक्ष्म जीव मुख्यतया हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से सीमित रखने में सहायता करते हैं। जैविक नियंत्रण से इन्हीं कारकों का प्रभावी ढंग से समन्वित कीट प्रबंधन में प्रयोग होता है, तथा मित्र कीटों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। बहुत सारे परभक्षी व परजीवी कीट प्राकृतिक दशा में मित्र कीट के रूप में पाये जाते हैं, जो हानिकारक कीटों के विभिन्न अवस्थाओं को क्षति पहुंचाते हैं। एक हेक्टेयर टमाटर की फसल को फलछेदक कीट से रोकथाम के लिए 2,50,000 ट्राइकोग्रामा परजीवी कीट का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार क्राइसोपरला कारनिया नामक परभक्षी कीट को 50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से दस दिन के अन्तराल पर तीन बार छोडऩे से सफेद मक्खी, हरा फुदका, माहू आदि से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। कीटों के प्राकृतिक षत्रु को प्रयोगशाला में अधिक संख्या में उत्पादन कर, उसे सफलतापूर्वक, आवष्यकतानुसार फसलों पर छोड़कर विषैले रसायनों के उपयोग में कमी लायी जा सकती है।

सूक्ष्म जीव द्वारा फसलों की सुरक्षा-

सूक्ष्म जीव कीटनाशियों के अन्तर्गत जीवाणु, कवक और विषाणु का प्रयोग करके हानिकारक कीटों में रोग उत्पन्न कर उनका नियंत्रण किया जा सकता है। यह रोग हानिकारक कीड़ों में महामारी की तरह फैलता है जिससे कीड़े मर जाते हैं। सूक्ष्म कीटनाशियों में बी.टी. का प्रयोग व्यवहारिक स्तर पर किया जा रहा है। जिसके प्रयोग से गोभी का हीरक पृष्ठ कीट, भिण्डी का तना एवं फल छेदक कीट, टमाटर का फल बेधक कीटों का नियंत्रण संभव हुआ है।

यांत्रिक विधि से कीटों का नियंत्रण-

कुछ कीट जिनको आसानी से देख जा सके उन्हें पकड़कर मार देना चाहिए। हड्डा बीटल, तम्बाकू की सूड़ीं के अण्डे तथा तना व फल को भेदकर खाने वाली सूड़ीं (बैगन व भिण्डी के फल छेदक कीट) को बहुत आसानी से देखकर कीट की विभिन्न अवस्थाओं को नष्ट कर देने से इनसे होने वाली क्षति से बचा जा सकता है। कीट नियंत्रण की इस विधि में लागत कम आती है एवं यह विधि सुरक्षित भी है।

व्यवहारिक नियंत्रण-

इस विधि के अन्तर्गत प्रौढ़ कीटों को फेरोमोन का प्रयोग कर भ्रमित किया जाता है। सब्जियों में मुख्य रूप से बैगन का तना व फल बेधक, तम्बाकू की सूंड़ी, टमाटर का फल बेधक एवं फल मक्खी को फेरोमोन द्वारा आकृष्ट कर नियंत्रण किया जा सकता है।
रसायनों का सुरक्षित एवं आवश्यक मात्रा का प्रयोग- रसायनों का अनियमित और अत्यधिक प्रयोग करने से कीटों में प्रतिरोधी क्षमता का विकास हो जाता है। साथ ही हानिकारक रासायनिक अवशेषों की वातावरण में वृद्धि होती है। समन्वित कीट प्रबंधन में यदि दूसरे कारकों के साथ सही संतुलन बनाकर सुरक्षित रसायनों की सही मात्रा एवं उचित अंतराल पर छिड़काव किया जाय तो कीटनाशी रसायन बहुत प्रभावी होता है। विभिन्न कीटनाशियों का अलग-अलग प्रतीक्षाकाल होता है। इसलिए दवा छिड़कने के बाद प्रतिक्षाकाल के बाद फल की तुड़ाई करने से रासायनिक अवयवों के अवषेष नहीं रहते हैं।
October 09, 2018

एलोवेरा की खेती भी किसानों को लाभ देती


ग्वारपाठा, घृतकुमारी या एलोवेरा जिसका वानस्पतिक नाम एलोवेरा बारबन्डसिस हैं तथा लिलिऐसी परिवार का सदस्य है। इसका उत्पत्ति स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है। एलोवेरा को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, हिन्दी में ग्वारपाठा, घृतकुमारी, घीकुंवार, संस्कृत में कुमारी, अंग्रेजी में एलोय कहा जाता है। एलोवेरा में कई औषधीय गुण पाये जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक एंव युनानी पद्धति में प्रयोग किया जाता है जैसे पेट के कीड़ों, पेट दर्द, वात विकार, चर्म रोग, जलने पर, नेत्र रोग, चेहरे की चमक बढ़ाने वाली त्वचा क्रीम, शेम्पू एवं सौन्दर्य प्रसाधन तथा सामान्य शक्तिवर्धक टॉनिक के रूप में उपयोगी है। इसके औषधीय गुणों के कारण इसे बगीचों में तथा घर के आस पास लगाया जाता है। 

पहले इस पौधे का उत्पादन व्यावसायिक रूप से नहीं किया जाता था तथा यह खेतों की मेढ़ में नदी किनारे अपने आप ही उग जाता है। परन्तु अब इसकी बढ़ती मांग के कारण कृषक व्यावसायिक रूप से इसकी खेती को अपना रहे हैं, तथा समुचित लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
एलोवेरा के पौधे की सामान्य उंचाई 60-90 सेमी. होती है। इसके पत्तों की लंबाई 30-45 सेमी. तथा चौड़ाई 2.5 से 7.5 सेमी. और मोटाई 1.25 सेमी. के लगभग होती है। एलोवेरा में जड़ के ऊपर जो तना होता है उसके उपर से पत्ते निकलते हैं, शुरूआत में पत्ते सफेद रंग के होते हैं। एलोवेरा के पत्ते आगे से नुकीले एवं किनारों पर कटीले होते हैं। पौधे के बीचो बीच एक दण्ड पर लाल पुष्प लगते हैं। हमारे देश में कई स्थानों पर एलोवेरा की अलग- अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। जिसका उपयोग कई प्रकार के रोगों के उपचार के लिये किया जाता है। इसकी खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसान भाई निम्न बातें ध्यान में रखे:-

जलवायु एवं मृदा

यह उष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। कम वर्षा तथा अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा सकती है। इसकी खेती किसी भी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। इसे चट्टानी, पथरीली, रेतीली भूमि में भी उगाया जा सकता है, किन्तु जलमग्न भूमि में नहीं उगाया जा सकता है। बलुई दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5 से 8.0 के मध्य हो तथा उचित जल निकास की व्यवस्था हो उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी

ग्रीष्मकाल में अच्छी तरह से खेत को तैयार करके जल निकास की नालियां बना लेना चाहिये तथा वर्षा ऋतु में उपयुक्त नमी की अवस्था में इसके पौधें को 50 & 50 सेमी. की दूरी पर मेढ़ अथवा समतल खेत में लगाया जाता है। कम उर्वर भूमि में पौधों के बीच की दूरी को 40 सेमी. रख सकते हैं। जिससे प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या लगभग 40,000 से 50,000 की आवश्यकता होती है। इसकी रोपाई जून-जुलाई माह में की जाती है। परन्तु सिंचित दशा में इसकी रोपाई फरवरी में भी की जा सकती है।

निंदाई-गुडाई

प्रारंभिक अवस्था में इसकी बढ़वार की गति धीमी होती है। अत: प्रारंभिक तीन माह तक में 2-3 निंदाई गुड़ाई की आवश्यकता होती है। क्योंंकि इस काल मे विभिन्न खरपतवार तेजी से वृद्धि कर ऐलोवेरा की वृद्धि एवं विकास पर विपरीत असर डालते हैं। 8 माह के बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ाएं जिससे वे गिरे नहीं ।

खाद एवं उर्वरक

सामान्यतया एलोवेरा की फसल को विशेष खाद अथवा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु अच्छी बढ़वार एवं उपज के लिए 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिला देना चाहिए । इसके अलावा 50 किग्रा. नत्रजन, 25 किग्रा. फास्फोरस एवं 25 किग्रा. पोटाश तत्व देना चाहिये । जिसमे से नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी रोपाई के समय तथा शेष नत्रजन की मात्रा 2 माह पश्चात् दो भागों में देना चाहिए अथवा नत्रजन की शेष मात्रा को दो बार छिड़काव भी कर सकते हैं।

सिंचाई

एलोवेरा असिंचित दशा में उगाया जा सकता है। परन्तु सिंचित अवस्था में उपज में काफी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करना उचित रहता है। सिंचाई जल की बचत करके एवं अधिक उपयोग करने के लिये स्प्रिंकलर या ड्रिप विधि का उपयोग कर सकते हैं।

पौध संरक्षण

इस फसल में साधारणतया कोई कीड़े अथवा रोग का प्रकोप नहीं होता है। परन्तु भूमिगत तनों व जड़ों को ग्रब नुकसान पहुंचाते हैं। जिसकी रोकथाम के लिये 60-70 किलोग्राम नीम की खली प्रति हेक्टर के अनुसार दें अथवा 20-25 किग्रा. क्लोरोपायरीफॉस डस्ट प्रति हेक्टर का भुरकाव करें । वर्षा ऋतु में तनों एवं पत्तियों पर सडऩ एवं धब्बे पाये जाते हैं, जो फफूंदजनित रोग है। जिसके उपचार के लिये मेन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना उपयुक्त रहता है।

अंतरवर्तीय फसल

एलोवेरा की खेती अन्य फल वृक्ष औषधीय वृक्ष या वन में रोपित पेड़ों के बीच में सफलतापूर्वक की जा सकती है।

कटाई एवं उपज

इस फसल की उत्पादन क्षमता बहुत अधिक हैं फसल की रोपाई के बाद एक वर्ष के बाद पत्तियां काटने लायक हो जाती है। इसके बाद दो माह के अन्तराल से परिपक्व पत्तियों को काटते रहना चाहिए। सिंचित क्षेत्र मे प्रथम वर्ष में 35-40 टन प्रति हेक्टर उत्पादन होता है। तथा द्वितीय वर्ष में उत्पादन 10-15 फीसदी तक बढ़ जाता है। उचित देखरेख एवं समुचित पोषक प्रबंधन के आधार पर इससे लगातार तीन वर्षों तक उपज ली जा सकती है। असिंचित अवस्था में लगभग 20 टन प्रति हेक्टर उत्पादन मिल जाता है।

प्रवर्धन विधि एवं रोपाई

इसका प्रवर्धन वानस्पतिक विधि से होता है। व्यस्क पौधों के बगल से निकलने वाले चार पांच पत्तियों युक्त छोटे पौधे उपयुक्त होते हैं, प्रारंभ में ये पौधे सफेद रंग के होते हैं, तथा बड़े होने पर हरे रंग के हो जाते हैं। इन स्टोलन/सर्कस को मातृ पौधे से अलग करके नर्सरी या सीधे खेत में रोपित करते हैं
October 09, 2018

मिर्च की तुड़ाई के समय क्या-क्या सावधानियां आवश्यक



मिर्च एक नगदी फसल है मिर्च हो या अन्य सब्जी फसल जिनका फलन लम्बे समय तक चलता है की मिर्च की तुड़ाई में यदि विशेष सावधानियां नहीं बरती गई तो पौधों को हानि होती है। मजदूरों को ऐसी हिदायत देना जरूरी होगा ताकि तुड़ाई ढंग से करें ताकि पौधों को कम से कम हानि पहुंचें।
– हरी मिर्च तोड़ते समय यह सावधानी रखें कि फूलों और अविकसित फलों को हानि नहीं पहुंचे।
– हरी मिर्च की तुड़ाई लगभग 6 से 8 बार हर सप्ताह की जाना चाहिये।
– सामान्यत: पके हुए फलों को थोड़े-थोड़े समय के अंतराल हाथ से तोड़ कर 3-4 तुड़ाई की जा सकती है।
– ग्रीष्म और शरदऋतु की फसल को पकने पर तोड़ते हैं। तथा सुखाकर बेचते हैं।
– अचार वाली मिर्च को हरी अवस्था में तोडं
– सुखाने के लिये पक्के फर्श पर सुखाये तथा पतली परते रखें तथा परतों को पलटते रहें।
October 09, 2018

taroi (nenua) ki kheti kaise kare - नेनुआ कैसे करे पूरी जानकरी हिंदी


क्या आप तोरई ( नेनुवा ) की खेती करने के बारे में सोच रहे है तो बहुत ही अच्छा सोच रहे है अगर हम दिल लगा कर कोई भी खेती करते है तो हम सफल हो जायेंगे लेकिन अगर हम खेती में लापरवाही करते है तो हमारी खेती और फसल अच्छा नहीं होगा बहुत सारे किसान खेती करके अच्छा पैसा कमा रहे है
नेनुआ की खेती बिहार ,उतर प्रदेश , केरला , बंगाल में की जाती है नेनुआ की खेती हर किस्म की मिटटी पे की जा सकती है नेनुआ बेल पे लगने वाली सब्जी है
नेनुआ की खेती जनवरी से फ़रवरी महीने में की जाती है और जून से जुलाई महीने में की जाती है
(तरोई)  नेनुआ की खेती हलकी और दोमट मिटटी में अच्छी तरह से की जा सकती है
( तरोई  ) की खेती आप घर में भी बहुत आराम से कर सकते है घर में नेनुवा के बुवाई के लिए आप पोट में भी इसकी बुवाई कर सकते है और रस्सी के सहारे अच्छा फसल लगा सकते है



 ( तरोई ) नेनुआ की बहुत सारी किस्मे होती है जैसे पूसा नारदार ,कोयम्बुर 1 ,कोयम्बुर 2 ,राजेंद्र नेनुवा 1 , पूसा चिकनी कल्याणपुर चिकनी ,
तरोई की बीज बनाने वाली बहुत सारी कंपनी है लेकिन मैं आपको सलाह दूंगा की आप अच्छे कंपनी के बीज बोये  अच्छे बीज आपको अच्छी पैदावार देगी और उससे अच्छे पैसे कमा सकते है 


तोरई के खेती कब करे ?

तोरई की बुवाई जनवरी के महीने से लेकर मार्च के महीने तक करे और जून से जुलाई के महीने में करे वैसे अगर आप जनवरी के लास्ट में करते है तो अच्छा होगा या फरवरी में क्यूंकि इस समय तापमान अच्छा रहता है और बीज अच्छे अंकुरित होते है 

तोरोइ की खेती के लिए खेत का चुनाव ?

तोरई की खेती लगभग सभी तरह के मिटटी में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छा जल निकास वाला मिटटी अच्छी होती है इसके लिए बलुई दोमट मिटटी अच्छी होती है 

खेत की तैयारी ?


तोरई की खेती की लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना अच्छा मन जाता है जुताई गहरी से गहरी करनी चाहिए उसके बाद सड़ी हुई गोबर की खाद, DAP, पोटाश, फोरेट 10 G, ज़िंक, को अच्छी तरह से पुरे खेत में डाले और जुताई करवाए लेकिन एक बात आपको याद रखने की जरुरत है आप बुवाई के समय खेत की नमी पे खास ध्यान दे क्यूंकि मिटटी में कम नमी के वजह से बीज अच्छे से अंकुरित नहीं हो पते है अगर आपके खेत में नमी की कमी है तो पहले सिचाई करे फिर उसकी जुताई कराये 

बुवाई कैसे करे ?


बुवाई के लिए क्यारिया बनाये और क्यारियों में बुवाई करे और जब आपके फसल अच्छे अंकुरित हो जाते है फिर आप सिंचाई पर ध्यान दे और नमी की कमी होती है तो सिंचाई करे और पौधे में अच्छी बढ़वार के लिए PG 50 और मास्क का स्प्रै करे हर 10 दिन पर PG 50 और कोई भी कीटनाशक मिला कर स्प्रै करने से आपके पौधे में अच्छी बढ़वार होगी और हानिकारक कीट से भी बचे रहेंगे तभी आप तोरई की खेती से अच्छा पैसा कमा पाएंगे 
 अगर आप अच्छी कंपनी का बीज की बुवाई किये है तो उसके फल 40 से 45 दिन में निकलने लगेंगे आप उसको नरम अवस्था में तुड़ाई करवाकर बाजार में बेच दे 
मुझे उम्मीद है आप तोरई की खेती के बारे में अच्छे से सिख लिया होगा अगर आपका कोई भी सवाल या सुझाव है तो हमें कमेंट बॉक्स में बताये .

October 09, 2018

भिंडी की खेती करके लाखो पैसे कमाए - पूरी जानकारी

अगर आप भिंडी की खेती करके लाखो पैसे कमाने की सोच रहे है तो आप बिलकुल सही सोच रहे है भिंडी की खेती करके आप लाखो कमा सकते है लेकिन उसके लिए आपको भिंडी की खेती के लिए सही जानकारी होना बहुत ही जरुरी है जैसे की किस समय पर बुवाई करना और किस समय पर सिंचाई करना और बीमारियों से कैसे बचाना है अगर आप ये  तरीको से जानते है तो आप अच्छी तरीके से खेती करके लाखो पैसे कमा सकते है आज मैं आपको इस पोस्ट में भिंडी यानि (ladyfinger) के बारे में पूरी जानकारी दूंगा



भिंडी की  खेती कैसे करे ?

भिंडी की खेती के लिए सबसे पहले अच्छे बीज का चुनाव जरुरी होता है और खेत का चुनाव अगर आप अच्छे खेत का चुनाव करते है तो आप अच्छी फसल का उम्मीद कर सकते है और सबसे जरुरी अच्छे बीज का चुनाव होता है क्यूंकि अगर हम अच्छे हाइब्रिड बीज का चुनाव करेंगे तो हमें अच्छी पैदावार मिलेगी और हम अच्छी आमदनी कमा पाएंगे बहुत सारे किसान भाई अच्छे बीज नहीं होने के वजह से उनका बहुत नुकसान होता है इस लिए मैं आपको हर पोस्ट में अच्छे बीज का चुनाव के बारे में बताता हूँ अच्छे बीज के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते है 

भिंडी की खेती कब करे ?

 अच्छे फसल के प्राप्ति के लिए सही मौसम का होना बहुत ही जरुरी  होता है मौसम की  होने के वजह से फसल का बहुत सारा नुकसान भी हो  सकता है भिंडी की खेती के लिए गर्मी का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है भिंडी की खेती के लिए काम से काम 20 डिग्री तापमान जरुरी है और ज्यादा से ज्यादा 40 डिग्री इससे ज्यादा होने पर फूल के गिरने का खतरा होता है 

खेती का चुनाव ?

 खेत में अच्छी फसल के लिए खेत का चुनाव अच्छे से करे जिसमे जल निकास अच्छा हो वैसे तो भिंडी की खेती हर तरह के मिटटी पे की जा सकती है लेकिन बलुई दोमट मिटटी अच्छी मानी जाती है भूमि का चुनाव करने के बाद खेत को अच्छी मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करवाए 2 ,3. बार अच्छे से जुताई करवा कर खेत को अच्छी तरह समतल कर दे 

खाद कैसे डाले ?

भिंडी की खेती  के लिए खाद भी बहुत जरुरी होता है खेत में जुताई से पहले सड़ी हुई गोबर की खाद डाले १ बार गहरी से गहरी जुताई करवाए और खर पतवार को अच्छी तरह से साफ़ कर ले बुवाई के पहले DAP खाद पोटाश ज़िंक सल्फर फोरेट 10 G डाल कर अच्छी तरह से मिलाये और खेत को समतल कर दे और ध्यान देने वाली बात है आपके खेत में अच्छी नमी होनी चाहिए खेत में अच्छी नमी नहीं होने के वजह से बीज अच्छी तरह अंकुरित नहीं हो  पाते है  इसलिए मैं आपको सलाह दूंगा की आप खेत की नमी पे भी खास ध्यान दे 

भिंडी की बुवाई कब करे ?

भिंडी की बुवाई जनवरी के लास्ट या फ़रवरी में करे इस समय तापमान 20 डिग्री रहता है इस समय आप बुवाई करते है तो बीज अच्छे अंकुरित होंगे वैसे तो आप मार्च के सुरुवाती में करते है तो भी आप अच्छी उपज कर सकते है इसके अलावा आप जून जुलाई में कर सकते है 

 सिंचाई कैसे करे ?

बीज बोन के 15-20 दिन बाद पहला निडाई गुड़ाई करना जरुरी होता है इस ये समय हमारे लिए बहुत ही धयान देने वाली होती है इस समय खरपतवार भी बहुत  उगते है इस समय खरपतवार को साफ करे और कीड़ो का भी बहुत प्रकोप होता है इस समय सिंचाई करे कोई भी कीटनाशक और ग्रोथ रेगुलेटर मिला कर स्प्रै करे ताकि पौधे की अच्छी बढ़वार हो सके जब भी खेत में नमी होती है तो सिंचाई करे क्यूंकि ज्यादा गर्मी  के वजह से नमी नहीं रह पाती है इस लिए समय पर सिंचाई जरूर करे 

किट / रोग से पौधे को कैसे बचाये ?

वैसे तो भिंडी में बहुत तरह के किट लगते है लेकिन मैं आपको इसके बारे में अच्छे से बताऊंगा आप इससे बहुत ही आसानी से बच सकते है और आप अच्छा पैसा कमा  सकते है 
बहुत सारे किट से बचने का एक उपाय है आप बुवाई के समय फोरेट 10 G का इस्तेमाल करे और पौधे जब 15 -20 दिन के हो जाये तब आप PG - 50 सल्फर और कीटनाशक मिला कर हर हप्ते में 1 बार स्पे करे 
ध्यान यही कोई भी दवा का स्प्रै करने के बाद फल को न तोड़े फल को तोड़ लेने के बाद स्प्रै करे 
बुवाई के 40 से 45 दिन बाद फल निकलने लगते है फल को नरम अवस्था में तोड़ कर बाजार में बेच दे फल को नरम अवस्था में तोड़ कर बाजार में बेचने से अच्छा कीमत मिलता है 

मुझे उम्मीद है की आपने भिंडी की खेती के बारे में अच्छी तरीके से समझ लिए होगा अगर आपका कोई भी सवाल या सुझाव है तो हमें कमेंट बॉक्स में बताये या हमें कांटेक्ट करे आप हमारे पास सभी तरह के सब्जी के बीज उपलब्ध है आप हर तरह के बीज के लिए संपर्क कर सकते है 

+91 - 9973667258

Monday, 8 October 2018

October 08, 2018

कैसे करें आम की खेती



परिचय
आम की खेती लगभग पूरे देश में की जाती हैI यह मनुष्य का बहुत ही प्रीय फल मन जाता है इसमे खटास लिए हुए मिठास पाई जाती हैI जो की अलग अलग प्रजातियों के मुताबिक फलो में कम ज्यादा मिठास पायी जाती हैI कच्चे आम से चटनी आचार अनेक प्रकार के पेय के रूप में प्रयोग किया जाता हैI इससे जैली जैम सीरप आदि बनाये जाते हैI यह विटामीन ए व् बी का अच्छा श्रोत हैI


जलवायु और भूमि

आम की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है?
आम की खेती उष्ण एव समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती हैI आम की खेती समुद्र तल से 600 मीटर की ऊँचाई तक सफलता पूर्वक होती है इसके लिए 23.8 से 26.6 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान अति उतम होता हैई आम की खेती प्रत्येक किस्म की भूमि में की जा सकती हैI परन्तु अधिक बलुई, पथरीली, क्षारीय तथा जल भराव वाली भूमि में इसे उगाना लाभकारी नहीं है, तथा अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि सवोत्तम मानी जाती हैI

प्रजातियाँ

आम के पेड़ लगाने से पहले वो कौन-कौन सी उन्नतशील प्रजातियाँ है?
हमारे देश में उगाई जाने वाली किस्मो में, दशहरी, लगडा, चौसा, फजरी, बाम्बे ग्रीन, अलफांसो, तोतापरी, हिमसागर, किशनभोग, नीलम, सुवर्णरेखा,वनराज आदि प्रमुख उन्नतशील प्रजातियाँ हैI

गड्डों की तैयारी में सावधानियाँ

आम की फसल तैयार करने के लिए गढ्ढ़ो की तैयारी किस तरह से करे और वृक्षों का रोपण करते समय किस तरह की सावधानी बरते?
वर्षाकाल आम के पेड़ो को लगाने के लिए सारे देश में उपयुक्त माना गया हैI जिन क्षेत्रो में वर्षा आधिक होती है वहां वर्षा के अन्त में आम का बाग लगाना चाहिएI लगभग 50 सेन्टीमीटर व्यास एक मीटर गहरे गढ्ढे मई माह में खोद कर उनमे लगभग 30 से 40 किलो ग्राम प्रति गड्ढा सड़ी गोबर की खाद मिटटी में मिलाकर और 100 किलोग्राम क्लोरोपाइरिफास पावडर बुरककर गड्ढो को भर देना चाहिएI पौधों की किस्म के अनुसार 10 से 12 मीटर पौध से पौध की दूरी होनी चाहिए, परन्तु आम्रपाली किस्म के लिए यह दूरी 2.5 मीटर ही होनी चाहिएI

प्रवर्धन या प्रोपोगेशन

आम की फसल में प्रवर्धन या प्रोपोगेशन किन- किन विधियो दवारा किया जा सकता है?
आम के बीजू पौधे तैयार करने के लिए आम की गुठलियों को जून-जुलाई में बुवाई कर दी जाती है आम की प्रवर्धन की विधियों में भेट कलम, विनियर, साफ्टवुड ग्राफ्टिंग, प्रांकुर कलम, तथा बडिंग प्रमुख है, विनियर एवम साफ्टवुड ग्राफ्टिंग द्वारा अच्छे किस्म के पौधे कम समय में तैयार कर लिए जाते हैI

खाद एवं उर्वरक

आम की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग कब करना चाहिए ?
बागो की दस साल की उम्र तक प्रतिवर्ष उम्र के गुणांक में नाइट्रोजन, पोटाश तथा फास्फोरस प्रत्येक को १०० ग्राम प्रति पेड़ जुलाई में पेड़ के चारो तरफ बनायीं गयी नाली में देनी चाहिएI इसके अतिरिक्त मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार हेतु 25 से 30 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद प्रति पौधा देना उचित पाया गया हैI जैविक खाद हेतु जुलाई-अगस्त में 250 ग्राम एजोसपाइरिलम को 40 किलोग्राम गोबर की खाद के साथ मिलाकर थालो में डालने से उत्पादन में वृदि पाई गयी हैI

सिंचाई का समय

आम की फसल सिचाई हमें कब करनी चाहिए, और किस प्रकार करनी चाहिए?
आम की फसल के लिए बाग़ लगाने के प्रथम वर्ष सिचाई 2-3 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए 2 से 5 वर्ष पर 4-5 के अन्तराल पर आवश्यकताअनुसार करनी चहियेI तथा जब पेड़ो में फल लगने लगे तो दो तीन सिचाई करनी अति आवश्यक हैI आम के बागो में पहली सिचाई फल लगने के पश्चात दूसरी सिचाई फलो का काँच की गोली के बराबर अवस्था में तथा तीसरी सिचाई फलो की पूरी बढवार होने पर करनी चाहिएI सिचाई नालियों द्वारा थालो में ही करनी चाहिए जिससे की पानी की बचत हो सकेI

गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण

आम की फसल में निराई गुड़ाई और खरपतवारो का नियंत्रण हमारे किसान भाई किस प्रकार करे?
आम के बाग को साफ रखने के लिए निराई गुड़ाई तथा बागो में वर्ष में दो बार जुताई कर देना चाहिए इससे खरपतवार तथा भूमिगत कीट नष्ट हो जाते है इसके साथ ही साथ समय समय पर घास निकलते रहना चाहिएI

रोग और नियंत्रण

आम की फसल में कौन कौन से रोग लगते है और उसका नियंत्रण हम किस प्रकार करें?
आम के रोगों का प्रबन्धन कई प्रकार से करते हैI जैसे की पहला आम के बाग में पावडरी मिल्ड्यू यह एक बीमारी लगती है इसी प्रकार से खर्रा या दहिया रोग भी लगता है इनसे बचाने के लिए घुलनशील गंधक 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में या ट्राईमार्फ़ 1 मिली प्रति लीटर पानी या डाईनोकैप 1 मिली प्रति लीटर पानी घोलकर प्रथम छिडकाव बौर आने के तुरन्त बाद दूसरा छिडकाव 10 से 15 दिन बाद तथा तीसरा छिडकाव उसके 10 से 15 दिन बाद करना चाहिए आम की फसल को एन्थ्रक्नोज फोमा ब्लाइट डाईबैक तथा रेडरस्ट से बचाव के लिए कापर आक्सीक्लोराईड 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अन्तरालपर वर्षा ऋतु प्रारंभ होने पर दो छिडकाव तथा अक्टूबर-नवम्वर में 2-3 छिडकाव करना चाहिएI जिससे की हमारे आम के बौर आने में कोइ परेशानी न होI इसी प्रकार से आम में गुम्मा विकार या माल्फर्मेशन भी बीमारी लगती है इसके उपचार के लिए कम प्रकोप वाले आम के बागो में जनवरी फरवरी माह में बौर को तोड़ दे एवम अधिक प्रकोप होने पर एन.ए.ए. 200 पी. पी. एम्. रसायन की 900 मिली प्रति 200 लीटर पानी घोलकर छिडकाव करना चहियेI इसके साथ ही साथ आम के बागो में कोयलिया रोग भी लगता हैI जिसको की किसान भाई सभी आप लोग जानते है इसके नियंत्रण के लिए बोरेक्स या कास्टिक सोडा 10 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिडकाव फल लगने पर तथा दूसरा छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए जिससे की कोयलिया रोग से हमारे फल ख़राब न हो सकेI

कीट और उनका नियंत्रण

कौन - कौन से कीट है, जो आम में लगते है, और उनका नियंत्रण किस प्रकार होना चाहिए?
आम में भुनगा फुदका कीट, गुझिया कीट, आम के छल खाने वाली सुंडी तथा तना भेदक कीट, आम में डासी मक्खी ये कीट हैI आम की फसल को फुदका कीट से बचाव के लिए एमिडाक्लोरपिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिडकाव फूल खिलने से पहले करते हैI दूसरा छिडकाव जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाये, तब कार्बरिल 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलकर छिडकाव करना चाहिएI इसी प्रकार से आम की फसल को गुझिया कीट से बचाव के लिए दिसंबर माह के प्रथम सप्ताह में आम के तने के चारो ऒर गहरी जुताई करे, तथा क्लोरोपईरीफ़ास चूर्ण 200 ग्राम प्रति पेड़ तने के चारो बुरक दे, यदि कीट पेड़ पर चढ़ गए हो तो एमिडाक्लोरपिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर जनवरी माह में 2 छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए तथा आम के छल खाने वाली सुंडी तथा तना भेदक कीट के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 0.5 प्रतिशत रसायन के घोल में रूई को भिगोकर तने में किये गए छेद में डालकर छेद बंद कर देना चाहिएI एस प्रकार से ये सुंडी ख़त्म हो जाती हैI आम की डासी मक्खी के नियंत्रण के लिए मिथाईलयूजीनाल ट्रैप का प्रयोग प्लाई लकड़ी के टुकडे को अल्कोहल मिथाईल एवम मैलाथियान के छः अनुपात चार अनुपात एक के अनुपात में घोल में 48 घंटे डुबोने के पश्चात पेड़ पर लटकाए ट्रैप मई के प्रथम सप्ताह में लटका दे तथा ट्रैप को दो माह बाद बदल देI

फलों को तोड़ने का समय

आम की फसल की तुड़ाई कब करनी चाहिए और किस प्रकार करनी चाहिए?
आम की परिपक्व फलो की तुड़ाई 8 से 10 मिमी लम्बी डंठल के साथ करनी चाहिए, जिससे फलो पर स्टेम राट बीमारी लगने का खतरा नहीं रहता हैI तुड़ाई के समय फलो को चोट व् खरोच न लगने दें, तथा मिटटी के सम्पर्क से बचायेI आम के फलो का श्रेणीक्रम उनकी प्रजाति, आकार, भार, रंग व परिपक्ता के आधार पर करना चाहिएI

उपज

आम की फसल से औसतन उपज कितनी प्राप्त कर सकते है?
रोगों एवं कीटो के पूरे प्रबंधन पर प्रति पेड़ लगभग 150 किलोग्राम से 200 किलोग्राम तक उपज प्राप्त हो सकती हैI लेकिन प्रजातियों के आधार पर यह पैदावार अलग-अलग पाई गयी हैI
October 08, 2018

जैविक खेती (Organic Farming)


जैविक खेती प्राचीन भारतीय कृषि प्रणाली है और यह आधुनिक रसायन प्रधान युग में भी प्रासंगिक है। ‘पर्यावरण में स्वच्छता तथा प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखकर मृदा, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना, भूमि को स्वस्थ एवं सक्रिय रखकर दीर्घकालिक उत्पादन प्राप्त करने को ही जैविक खेती या प्राकृतिक खेती कहते है।’ इस पद्धति में उर्वरकों व रसायनों का कम-से-कम उपयोग किया जाता है, इसलिये यह सस्ती और टिकाऊ है तथा सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यावरण के अनुकूल है।


मृदा भौतिक माध्यम न होकर जैविक माध्यम है जिसकी सुरक्षा परमावश्यक है, टिकाऊ खेती से तात्पर्य प्राकृतिक एवं कृत्रिम वृद्धि निवेशों के ऐसे सम्भावित प्रबन्ध से है जिसके तहत प्राकृतिक स्रोतों की गुणवत्ता, वर्तमान व भविष्य में उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण के सन्तुलन को बनाए रखते हुए किया जाये। ऐसी तकनीकें जो लम्बे एवं कम समय तक दोनों दशाओं में अधिक सुदृढ़ एवं पर्यावरण सम्मत हो, वही टिकाऊ हो सकती है। प्राकृतिक स्रोत केवल भोजन, चारा, कपड़ा, ईंधन आदि ही नहीं देते बल्कि ये पर्यावरण सन्तुलन भी विभिन्न क्रियाओं द्वारा बनाये रखते हैं।

जैविक खेती ऐसी कृषि कार्यशाला है जो कि रसायनों के ऊपर निर्भरता को कम करती है। रासायनिक खेती की अपेक्षा सस्ती है क्योंकि इस पद्धति के अन्तर्गत वनस्पति व जीवों के द्वारा भूमि व भूमि तत्वों का उपयोग किया जाता है व भूमि के वनस्पति, प्राणी व अन्य जैविक वस्तुओं द्वारा बनी खाद भूमि को लौटाई जाती है।

अब भविष्य में देश की निर्बाध गति से बढ़ती जनसंख्या का पेट भर भोजन उपलब्ध कराने के लिये खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में स्थायित्व लाने के लिये सिमटते प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को अधिक तर्क संगत बनाने के साथ-साथ उनकी उपयोग क्षमता में भी सुधार लाना होगा। जैविक व कृषि पद्धतियों का प्रयोग कर खरपतवार, कीट व रोगों का नियंत्रण करना ताकि भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ मृदाक्षरण व जल ह्रास को रोकना टिकाऊ खेती या प्राकृतिक खेती ये एक दूसरे में पर्याय हैं। मृदा की उर्वरा शक्ति कार्बनिक पदार्थों के बेहतर प्रबन्धन से बढ़ाई जा सकती है।

विश्व व्यापार समझौते के अनुसार कृषक अब उन्हीं उत्पादों का निर्यात कर सकेंगे जो किसी प्रकार से प्रदूषित नही हो एवं केवल जैविक विधियों से ही उत्पादित हो और जो मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नही डालें। इस प्रकार जैविक खेती से जहाँ ग्रामीण स्तर की स्वच्छता बढ़ाई जा सकती है, वहीं खेतीहर मजदूरों, लघु, सीमान्त कृषकों की स्वमेव आमदनी बढ़ेगी तथा बाहरी आदान सामग्री खाद, बीज, दवा नहीं खरीदने पर लागत में कमी और मुनाफा अधिक होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा।

जैविक खेती के गुण


1. सरल, सस्ती, स्वावलम्बी और स्थायी है।
2. मृदा संरचना में अद्भुत सुधारक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की सन्तुलित पैदावार एवं भूमि की निरन्तरता बनाए रखती है।
3. प्रदूषण विहीन भूमि, जल, वायु एवं पर्यावरण से जन स्वास्थ्य को रोग-मुक्त रखती है।
4. ग्राम स्वावलम्बन पर आधारित स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा।
5. इसे अपनाना सम्भव है व उसकी आज के सन्दर्भ में आवश्यकता निर्विवाद है।
6. यह कृषि उत्पादन की वह कार्यशाला है जिसमें कई उपायों के मध्य समन्वय स्थापित किया जाता है।
7. इसे किसान भाई आसानी से अपना सकते हैं।
8. यह परम्परागत प्राचीन खेती है जिसे मध्य युग की कृषि पद्धति ने बिगाड़ दिया है जिसे पुनः स्थापित किया जाना है।
9. भूमि को बंजर होने से रोकना है।
10. इसमें रसायनों का उपयोग कम-से-कम होता है।
11. पर्यावरण पारिस्थितिकीय मित्र भी है।
12. जैविक खेती से वर्षा आधारित खेती में विपुल उत्पादन सम्भव है।
13. भारत की खाद्य समस्या का समाधान जैव पौध पोषण को मुख्य आधार बनाकर सम्भव है।
14. वर्षा आधारित व सिंचित कृषि में उत्पादकता बढ़ाना सम्भव है। यदि उत्पादन तकनीकी में परिवर्तन, जो कम खर्च व सदाबहार टिकाऊ तकनीकी पर आधारित है, को शीघ्रता से अपनाया जा सकता है।
15. कृषि की प्रत्येक योजना का लक्ष्य कृषि उत्पादन को स्थायित्व देने में जैविक खेती की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
16. इस प्रणाली में उत्पादन लागत कम की जा सकती है और उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है जिससे हमारा देश वैश्वीकरण के दौर में विश्व बाजार में प्रतियोगिता कर सकता है।

जैविक खाद


पादप अवशेष, पशु और मानव अवशिष्ट पदार्थ से बनी खादों को जैविक खाद कहते हैं। स्थूल कार्बनिक खादों में गोबर की खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद व सान्द्रित कार्बनिक खाद में खलियाँ, पशु जनित व मछली की खादें आती हैं। जैव उर्वरकों राइजोबियम नीली हरी शैवाल व फास्फोटिक बैक्टीरिया आते हैं।

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन का प्रमुख उद्देश्य


1. उर्वरकों की उपयोग क्षमता में वृद्धि करना।
2. फसलों की उत्पादकता बढ़ाना।
3. मृदा उर्वरता को बढ़ाना एवं उसे स्थिर रखना।
4. किसानों की सामाजिक तथा आर्थिक दशा को बदलना।
5. पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना।

जैविक खादों का मृदा गुणों पर प्रभाव

मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव


1. मृदा में जावांश स्तर में वृद्धि के कारण भुरभुरापन एवं वायु संचार में वृद्धि होती है।
2. मृदा की जलधारण एवं जल सोखने की क्षमता में सुधार (35-40 प्रतिशत) होता है।
3. मृदा ताप को भी नियंत्रित रखती है।
4. जडों का विकास अच्छा होने के कारण मृदा क्षरण की सम्भावना कम होती है।
5. मृदा दानेदार बनती है।
6. मृदा से जल ह्रास कम होता है।
7. मिट्टी की सुघटयता (Plasicity) तथा संसंजन (Cohesion) को घटाना है।
8. भू-क्षरण कम होता है।
9. चिकनी काली मिट्टी (Friable) भुरभुरा बनती है।

मृदा के रासायनिक गुणों पर प्रभाव


1. प्रमुख पोषक तत्वों (प्राथमिक पोषक तत्वों) की पूर्ति के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों, हारमोंस एवं एंटीबायोटिक्स की मात्रा भी प्राप्त होती है जो विशेष लाभकारी है।
2. ताजे कार्बनिक पदार्थ सड़ने पर साइट्रेट आक्सलेट ट्राइप्लेट व लैक्ट्रेट पैदा करते हैं। जो लौह व एल्युमीनियम को बाँधकर फॉस्फेट की उपलब्धता को बढ़ाते हैं।
3. पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने के कारण कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है।
4. मृदा में अनुपलब्ध तत्वों की उपलब्धता जीवांश में वृद्धि के कारण अपने आप बढ़ जाती है।
5. मिट्टी की उभय प्रतिरोधी क्षमता (Buffering Capacity) बढ़ती है।
6. अमोनियम आयन को अपने साथ संयुग्मित कर अमोनियम के निक्षालन (Leaching) को कम होता है।
7. मृदा के लवणीयता एवं क्षारीयता में सुधार होता है।
8. मृदा में घनापन अतिशोषण क्षमता (Cation adsorption Capacity) बढ़ती है।
9. मृदा में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम को विनिमय योग्य रूप में संचित रखती है।
10. इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश व गंधक कार्बनिक रूपों में पाये जाते है।
11. इनके अपघटन से जो अम्ल उत्पन्न होते है, वे खनिजों को घोलकर पोषक तत्वों को मुक्त करते हैं।

मृदा के जैविक गुणों पर प्रभाव


1. मृदा में लाभदायक जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
2. लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।
3. सूक्ष्म जीवों के लिये भोजन व ऊर्जा प्रदान करती है। ये सूक्ष्मजीव अमोनीकरण, नाइट्रीकरण, नाइट्रोजन यौगिकीकरण आदि से योग सम्पन्न करते हैं।
4. जीवाणु जटिल पदार्थों को विच्छेदित कर आयनिक रूप में पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
5. अनेक जीवाणु मृदा से पोषक तत्व लेकर पौधों को प्रदान करते हैं।

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन के प्रमुख घटक

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन


गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, गोबर गैस की खाद, खलियाँ की खाद, तालाब की मिट्टी की खाद, मुर्गी की खाद व पशु जनित खाद।

हरी खाद से पोषक तत्व प्रबन्धन


हरी खाद व फसल अवशेष प्रबन्धन।

जीवाणु उर्वरकों से पोषक तत्व प्रबन्धन


राईजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, नील हरित काई, एजोला, स्फुिरघोलक, सूक्ष्म जीवाणु, माइकोराइजा।

दलहन फसलों से पोषक तत्व प्रबन्धन


फसल चक्रों में दलहनों का समावेश अन्तरवर्ती खेती में दलहनों का समावेशन।


जैविक खाद प्रबन्धन


जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, गोबर गैस की खाद, खलियाँ, प्रेसमड, शीरा व पशुजनित खाद के बारे में विस्तृत विवरण यहाँ दिया जा रहा है। अन्य जैविक खाद जैसे कम्पोस्ट, वर्मीकमोस्ट, हरी खाद तथा जैव उर्वरकों के बारे में विस्तृत विवरण में दिया गया है।

1. गोबर की खाद


हमारे प्रदेश में अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र में ईंधन की कमी होने के कारण गोबर के कण्डे लाकर जलाते हैं और बहुमूल्य खाद नष्ट कर देते हैं। आज हमारा देश वैज्ञानिक दृष्टि से प्रगतिशील माना जाता है लेकिन गाँव में आज भी किसान बहुमूल्य खाद को आम रास्ता, घर के आसपास एवं खेत की मेड़ पर प्रतिदिन घर के कूडा-करकट व गोबर को खुले वातावरण में इकट्ठा करता है उसकी कोई उपयोगिता नहीं की जाती है। परिणामस्वरूप कुछ खाद तेज हवा से व जानवर निकलने से इधर-उधर बिखरकर नष्ट हो जाता है। खुले में पड़े रहने से तेज गर्मी के कारण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। वर्षा होने से जल में पोषक तत्व घुलकर बह जाते हैं। इस खुले पड़े खाद से वातावरण दूषित होता है और उसमें कई तरह के रोग भी फैलते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसान गोबर की खाद का उपयोग कैसे व कब करें से अनभिज्ञ है। किसान गर्मी के महीनों में गोबर की खाद को खेत में छोटे-छोटे ढेर के रूप में खेत में डाल देते हैं। लेकिन इस विधि से खाद का उपयोग करने से कोई लाभ नहीं होता है, क्योंकि तेज गर्मी के कारण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। गोबर की खाद में 50 प्रतिशत अंश पशुमूत्र से प्राप्त होता है लेकिन कोई भी किसान पशुमूत्र को इकट्ठा कर खाद के गड्ढे तक नहीं डालते। पशुओं के नीचे मिट्टी, भूसा, गन्ने की पत्ती व धान की पुआल का बिछावन करना चाहिए ओर बिछावन हर दूसरे और तीसरे दिन खाद के गड्ढे में पहुँचाना चाहिए।

खाद बनाने की विधि


किसान भाई गोबर को जमीन के ऊपर ढेर लगाकर इकट्ठा करते हैं और गोबर बनाने की यह विधि वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नही है अतः खाद बनाने के लिये आवश्यकतानुसार गड्ढे किसी ऊँचे स्थान पर खोद लेना चाहिए जहाँ पानी नही भरता हो। गड्ढे की गहराई 1.25 मीटर से अधिक नही रखें क्योंकि विघटन करने वाले जीवाणुओं को अधिक गहराई पर ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और सड़न प्रक्रिया सुचारू रूप से नहीं चलती है। गड्ढे की लम्बाई-चौड़ाई आवश्यकतानुसार 3x4 मीटर रखना चाहिए। गड्ढे का फर्श पक्का हो तो अच्छा रहता है, इससे पोषक तत्व रिसकर नीचे नहीं जा पाते। गड्ढा तैयार हो जाने पर उसमें मलमूत्र गोबर व बिछावन प्रतिदिन डालते रहना चाहिए। जब गड्डा भरकर भूमि से आधा मीटर ऊँचा हो जाये तो 15 सेमी. मिट्टी की मोटी तह से ढँक देना चाहिए। इस प्रकार 6 महीने में गोबर की खाद बनकर तैयार हो जाएगी। अच्छे गोबर की खाद में नाइट्रोजन (नत्रजन), स्फुर व पोटाश क्रमशः 0.5, 0.25 व 0.5 होती है। गोबर की खाद की गुणवत्ता बढ़ाने हेतु खाद प्रति टन 20 किग्रा फॉस्फोरस मिलाना चाहिए इससे खाद में अमोनिया के रूप में होने वाली हानि कम होगी तथा फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ेगी।

खाद डालने का समय


खेत में खाद काफी पहले डालने से उसका प्रभाव काफी कम हो जाता है। हवा व तेज धूप द्वारा पोषक तत्व नष्ट हो जाते है। लिचिंग द्वारा पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और कुछ पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में भूमि में स्थिर हो जाते हैं। अतः गोबर की खाद को फसल बोने से लगभग 2 सप्ताह पहले खेत में डालकर मिला देना चाहिए।

खाद की मात्रा


गोबर की खाद की मात्रा खाद की उपलब्धता, मिट्टी की किस्म, फसल, उसकी किस्म, वर्षा, नमी तथा किसान की खाद खरीदने की क्षमता पर निर्भर करती है। साधरणतः 10 टन प्रति एकड़ खाद फसलों के लिये तथा 20 टन प्रति एकड़ खाद सब्जियों के लिये पर्याप्त होती है।

2. घरेलू कचरे से खाद


आपने देखा होगा कि हमारे देश के कस्बों व शहरो में कचरा सफाई व निष्पादन की विकट समस्या है, यदि कचरा सफाई पर एक दिन भी ध्यान नहीं दिया गया तो कचरे के ढेर लग जाते हैं और स्थिति अत्यन्त भयानक होने लगती है क्योंकि कचरे के ढेर पर मक्खियाँ, मच्छर एवं अन्य हानिकारक कीटाणु पनपने लगते हैं जो रोग फैलाने में सहायक होते हैं। पेयजल भी प्रदूषित होने लगता है या सम्भावना बनी रहती है। गाँवों की स्थिति तो और भी खराब है, क्योंकि यहाँ पर कचरे के साथ पशु के मलमूत्र भी रास्ते व गलियों में फैले रहते हैं, सब्जियों व फलों के छिलके, अण्डों के छिलके, आम की गुठलियाँ, रसोई की जूठन, बासी रोटी, चावल, दाल, उबली चाय की पत्ती, आटे का छना हुआ चोकर, घर के बगीचे व आँगनबाड़ी से पेड़-पौधों की सड़ी पत्तियाँ, गोबर व पशु मूत्र आदि है। इस प्रकार के कचरों को जीवांश कचरा कहते हैं। निम्नलिखित प्रक्रियाओं द्वारा वर्मी (केंचुआ) खाद तैयार कर सकते हैं।

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की प्रक्रिया


वर्मी कम्पोस्ट बनाने हेतु मुख्य सामग्री घास, पत्तियाँ, रसोईघर की जूठन, सब्जियों के छिलके व गोबर हैं। घर के पिछवाड़े में ईंट-चूना की एक टंकी बनाएँ स्थान के अनुसार टंकी की लम्बाई 2 मीटर, ऊँचाई व चौड़ाई 1 मीटर रखें। टंकी के पेंदे में ईंट के टुकड़े, मध्यम आकार की मिट्टी एवं बजरी की 5 सेमी तह बनाएँ। यह जल निकास में सहायक होती है। इसके ऊपर 10 सेमी की दोमट मिट्टी की तह बिछाएँ इसके बाद ऊपर 5 किलो मिट्टी को पानी में घोलकर छिड़के। अपने क्षेत्र में उपलब्ध स्रोतों से 400-500 केंचुए इकट्ठे करके क्यारियों मे रख दें। बाजार में वर्मीकल्चर केंचुए भी उपलब्ध हैं, इसका भी उपयोग किया जा सकता है। ऊपर से भूसा, पेड़ों की पत्तियाँ, सब्जियों के छिलके, रसोईघर की जूठन इत्यादि बिछा दें। अब इसके ऊपर थोड़ा सा गोबर का पानी छिड़क कर इसे बड़े पत्ती या अनुपयोगी कागज, गत्ते आदि से ढँक दें। आवश्यकतानुसार समय-समय पर पानी का छिड़काव करें। एक माह पश्चात गत्ते, अखबार, हटाकर पुनः उपलब्ध जीवांश कचरे की 5-6 सेमी की तह एक दो दिन के अन्तराल से बिछाते रहें। प्रत्येक बिछावन के साथ उसे जल से सीचें। एक माह में पोषण पदार्थ जैसे- नत्रजन, स्फुर, पोटाश अन्य पोषक तत्व, वृद्धिवर्धक तत्व व रोग रोधक गुणों वाला वर्मीकम्पोस्ट उपलब्ध होता है। इस प्रकार की 2 मीटर लम्बी टंकी से दो माह में लगभग 65 किग्रा कम्पोस्ट उपलब्ध होता है। इस खाद को हमारे घर के बगीचे में, सब्जियों में, फल वृक्ष में, फूल के पौधों में, गमलों में या सजावट के पत्तीदार पौधों के लिये उपयोग कर सकते हैं। पौधों में जहाँ यह खाद देंगे वहाँ खाद के साथ केंचुओं के अंडे भी होंगे जिनसे बाद में केंचुए निकलकर अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं। नमी बनाए रखें और जैव कचरा पौधों की क्यारियों मे देते रहें इससे केंचुए उसे भी खाद में परिवर्तित करते रहेंगे। इस विधि से प्राप्त कम्पोस्ट के उपयोग से फल-फूल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं जो उच्च गुणवत्ता वाले होंगे। वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से पेड़ पौधों की कीट आदि जैसे हानिकारक कारकों के प्रति प्राकृतिक निरोधकता में वृद्धि होती है, अतः रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च में कटौती के साथ-साथ पौध संरक्षण कार्य हेतु कीट व्याधि रसायनों के उपयोग में भी कटौती सम्भव हो जाती है।

3. गोबर गैस स्लरी की खाद


गोबर गैस संयंत्र एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा स्थूल कार्बनिक अवशिष्टों से ज्वलनशील गैसों के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस गैस संयंत्र में पशुओं के गोबर और अन्य सैल्यूलोज युक्त सामग्रियों को कुछ दिनों के लिये अवायुवीय दशाओं अर्थात ऑक्सीजन के अभाव में सड़ने दिया जाता है। इन दशाओं में मुख्य रूप से मिथेन, हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण तैयार होता है। जिसका उपयोग खाना बनाने के लिये ईंधन और अन्य कार्यों के लिये किया जाता है। ऊर्जा प्राप्त करने के उपरान्त बचे अवशिष्ट पदार्थ से पोषक खाद प्राप्त होती है।

बायोगैस संयंत्र में गोबर की पाचन क्रिया के बाद 25 प्रतिशत ठोस पदार्थ का रुपान्तर गैस के रूप में होता है और 75 प्रतिशत ठोस पदार्थ का रुपान्तर खाद के रूप में होता है। 2 घनमीटर के गैस संयंत्र में जिसमें करीब 50 किलो गोबर प्रतिदिन एवं 18.25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता है, उस गोबर से नमीयुक्त करीब 9.2 टन बायोगैस स्लरी का खाद प्राप्त होता है।

यह खाद खेती के लिये अति उत्तम खाद होती है। इसमें नाइट्रोजन 1.5 से 2 प्रतिशत, फास्फोरस 1.0 प्रतिशत एवं पोटाश 1.0 प्रतिशत तक होता है। बायोगैस संयंत्र से जब स्लरी के रूप में खाद बाहर आता है तब जितना नाइट्रोजन गोबर में होता है उतना ही नाइट्रोजन स्लरी में होता है, परन्तु संयंत्र में पाचन क्रिया के दौरान कार्बन का रुपान्तर गैसों में होने से कार्बन की मात्रा कम होने से कार्बन नाइट्रोजन अनुपात कम हो जाता है व इससे नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी हुई प्रतीत होती है।

बायोगैस संयंत्र से निकली पतली स्लरी में 20 प्रतिशत नाइट्रोजन, अमोनिया के रूप में होता है। अतः यदि इसका तुरन्त उपयोग खेत में नालियाँ बनाकर अथवा सिंचाई के पानी में मिलाकर खेत में छोड़कर किया जाये तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरह से फसल पर तुरन्त होता है और उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़त हो सकती है। स्लरी खाद को सुखाने के बाद उसमें से नाइट्रोजन का कुछ भाग हवा में उड़ जाता है। यह खाद सिंचाई रहित खेती में एक हेक्टेयर में करीब 5 टन व सिंचाई वाली खेती में 10 टन प्रति हेक्टेयर मात्रा में डाला जाता है। बायोगैस स्लरी खाद में भी नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश इन मुख्य तत्वों के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषक तत्व एवं ह्ययूमस होता है जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होता है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्म जीवाणु बढ़ते हैं। इस खाद के उपयोग से भी अन्य जैविक खाद की तरह 3 वर्षों तक अन्य उपयोगी तत्व पसलों को उपलब्ध होते रहते हैं व एक बार खाद देने से 3 वर्ष तक अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है।

स्लरी का संग्रहण


यदि गोबर गैस संयंत्र घर के पास व खेत से दूर है तब पतली स्लरी का संग्रहण करने के लिये बहुत जगह लगती है व पतली स्लरी का स्थानान्तरण भी कठिन होता है ऐसी अवस्था में स्लरी को सुखाना अत्यन्त आवश्यक है। इसमें बायोगैस को निकास कक्ष से जोड़कर 2 घनमीटर के संयंत्र के लिये 1.65 मीटर X 0.6 मीटर X 0.5 मीटर के दो सीमेंट के टैंक बनाए जाते हैं इसके दूसरी तरफ छना हुआ पानी एकत्र करने हेतु एक पक्का गड्ढा बनाया जाता है। फिल्ट्रेशन टैंक के नीचे 15 सेमी. मोटाई का कचरा, कूड़ा-कचरा, हरा-कचरा इत्यादि डाला जाता है। इस पर निकास कक्ष से जब द्रव रूप की स्लरी गिरती है तब स्लरी का पानी कचरे के तह से छनकर नीचे गड्ढे में एकत्रित हो जाता है। इस तरह एकत्रित पानी बायोगैस संयंत्र में गोबर की भराई के समय डाला जाता है उसका 2/3 हिस्सा गड्ढे में पुनः एकत्रित हो जाता है। इसे गोबर के साथ मिलाकर पुनः संयंत्र में डालने से गैस उत्पादन बढ़ जाता है इसके अलावा इसमें सभी पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में होते हैं। अतः इसका छिड़काव पौधों पर करने से पौधों का विकास अच्छा होता है, कीड़े मरते हैं एवं फसल में वृद्धि होती है। करीब 15-20 दिन में पहला टैंक भर जाता है तब इस टैंक को ढँककर स्लरी का निकास दूसरे टैंक में खोल दिया जाता है। जब तक दूसरा टैंक स्लरी से भरता है तब पहले टैंक में स्लरी सूख जाती है व 25-30 प्रतिशत नमी वाला खाद टैंक से बाहर निकाल लिया जाता है। इसका भण्डारण अलग से गड्ढे में किया जाता है अथवा इसको बैलगाड़ी में भरकर खेत तक पहुँचाना आसान होता है।

फिल्ट्रेशन टैंक की मदद से बायोगैस की स्लरी का अधिक संग्रहण किया जा सकता है व फिल्ट्रेट पानी के बाहर निकलने व उसका संयंत्र में पुनः उपयोग करने से पानी की भी बचत होती है।

इस प्रकार बायोगैस संयंत्र से बायोगैस द्वारा ईंधन की समस्या का समाधान हो ही जाता है। साथ में स्लरी के रूप में उत्तम खाद भी खेती के लिये प्राप्त होता है। अतः बायोगैस संयंत्र से किसान को दोबारा लाभ मिलता है।

गोबर गैस के मुख्य लाभ


1. कार्बनिक-अवशिष्टों से बने पोषक तत्वों की हानि से ईंधन गैस और खाद प्राप्त होती है, इससे जलाने की लकड़ी में बचत होती है।
2. संयंत्र पूरी तरह से स्वास्थ्यप्रद और शुद्ध दशाओं में कार्य करता है। इससे गन्दी महक नहीं आती। मक्खियों और मच्छरों का जनन रुक जाता है।
3. कम्पोस्ट विधि की तुलना में इस विधि में नाइट्रोजन की हानि बहुत कम होती है।

4. खलियों के खाद


हमारे देश में अनेक किस्म की खलियाँ तैयार की जाती हैं जिनका इस्तेमाल सान्द्रित कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है। इसमें पोषक तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। मूँगफली की खली, तिल की खली, सरसों की खली जिसका इस्तेमाल जानवरों के आहार के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग खाद के रूप में नहीं करना चाहिए। अन्य अखाद्य खलियाँ जैसे- अरण्डी की खली, नीम की खली, करंज की खली जो कि विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति के कारण पशु आहार के लिये उपयुक्त नहीं होती, उनका खाद के रूप में उपयोग लाभदायक रहता है। खलियों में नाइट्रोजन की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है।

खलियों में पाई जाने वाली नाइट्रोजन का 70-80 प्रतिशत मात्रा पौधों को शीघ्र प्राप्त होता है किन्तु इन्हें फसल की बुआई के 15-25 दिन पहले उपयोग करना चाहिए। उपयोग करने से पूर्व इन्हें अच्छी तरह पाउडर के रूप में बना लेना चाहिए, ताकि इनका एक साथ इस्तेमाल किया जा सके। लम्बे समय की फसल जैसे गन्ना में इनका उपयोग खड़ी फसल में भी कर सकते हैं। सामान्य तौर पर 10-30 क्वि./हे. खलियों का उपयोग कर सकते हैं। वैसे तो खलियों की मात्रा फसल, भूमि का प्रकार, जलवायु तथा खली की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

5. मुर्गी की खाद


मुर्गी की खाद मे 1/3 भाग बीट, 1/3 भाग दाना, भूसा व पेशाब आदि का मिश्रण होता है, उसमें 1.1 प्रतिशत नत्रजन, 1.5 प्रतिशत स्फुर व 1.6 प्रतिशत पोटाश तत्व के अतिरिक्त अन्य आवश्यक तत्व कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन व सोडियम भी पाये जाते हैं। इस खाद से पौधों में रोगरोधी क्षमता में वृद्धि होती है। 100 अंडे देने वाली मुर्गियों से एक वर्ष में 4 टन मुर्गी खाद प्राप्त होती है, जबकि मांस हेतु 100 मुर्गियों से 1 वर्ष में 1 टन खाद प्राप्त होती है। उपयोग के समय मृदा में पर्याप्त नमी हो व अन्य जीवांश खादों के साथ मिलाकर 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

6. पशुजनित खादें


पशु जनित उत्पाद का खाद के रूप में भी इस्तेमाल होता है। इसमें पशु कंकाल से तैयार खाद या भूचड़खाने से प्राप्त पदार्थ जैसे- शुष्क रक्त, मांस की खाल, सींग व खुर की खाद आदि सर्वाधिक प्रचलित है। शुष्क रक्त या रक्त की खाद में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है और यह शीघ्र कारगर होती है और सभी फसलों पर लाभकारी होती है। इनका उपयोग खलियों की भाँति ही करना चाहिए। मछली भोजन के रूप में पाई जाती है। नाइट्रोजन के अलावा इसमें एक अच्छे अनुपात में फॉस्फोरस भी पाया जाता है। मछली की खाद से पोषक तत्वों की पूर्ति शीघ्र होती है और इनका उपयोग सभी फसलों में किया जा सकता है। पक्षियों द्वारा विसर्जित मल-मूत्र, मैला आदि पशु और मानव जनित अवशिष्ट पदार्थों की श्रेणी में आते हैं।

7. तालाब की सड़ी मिट्टी की खाद


पुराने तालाब की सड़ी मिट्टी का प्रयोग जीवांश खाद के स्रोत के रूप में किया जा सकता है जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ उर्वरता में भी सुधार आता है। वर्षा ऋतु में शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की सभी भूमियों से जल बहकर तालाबों में इकट्ठा होता है। पानी के साथ-साथ मल-मूत्र, खेतों के उर्वर अंश, पशु तथा पौधों के अवशेष भी तालाबों में एकत्रित होते रहते हैं। जब पानी कुछ स्थिर हो जाता है, तो घुलित मिट्टी आदि व अन्य पदार्थ नीचे पेंदी में बैठ जाते हैं। पेंदी में बैठी ऐसी मिट्टी को तालाब मिट्टी खाद अथवा टैंकेज कहते हैं। तालाबों की सतह की 12 इंच मोटी मिट्टी अधिक उर्वरक होती है। इस मिट्टी में 1.0 से 4.0 प्रतिशत तक नमी पाई जाती है तथा स्फुर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। तालाब की मिट्टी की खाद का खेत में 25-30 टन प्रति हेक्टेयर उपयोग किया जा सकता है।