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Tuesday, 9 October 2018

October 09, 2018

सब्जी उत्पादन में कीट नियंत्रण

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के तरीकों की सफलता मुख्यतया हानिकारक कीट एवं मित्र कीटों की निगरानी के आधार पर कीट प्रबंधन के विभिन्न घटकों के एकीकरण कर सही निर्णय को लागू करने के ऊपर निर्भर है।

फसल चक्रअपनाकर कीट नियंत्रण-

किसी भी खेत में सब्जियों को लगाते समय उचित फसल-चक्र अपनाना चाहिए जिससे एक ही कुल की सब्जी को पुन: नहीं लगाना चाहिए। इस विधि से निरन्तर जीवन चक्र , अपेक्षाकृत संख्या एवं क्षति स्तर कम किया जा सकता है।

बुवाई व पौध रोपण के समय में परिवर्तन करके-

कीटों के प्रति फसल की मुलायम अवस्था को ध्यान में रखकर फसल की बुवाई तथा रोपाई के समय में परिवर्तन करके अधिक हानि से बचाया जा सकता है। सब्जियों की बुवाई व रोपाई के समय में परिवर्तन कर लाल भृंग कीट, फल मक्खी, तना एवं फल छेदक कीट के प्रकोप को कम किया जा सकता है। पौधों की बुवाई व रोपाई ऐसे समय में करना चाहिए, जब पौधों की नाजुक अवस्थाएं एवं हानिकारक कीटों की निष्क्रिय अवस्थाएं समानान्तर हों।

सस्य क्रियाओं द्वारा कीट प्रबंधन-

कीट प्रबंधन में इस घटक के ऊपर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता है, साथ ही यह पर्यावरण को सुरक्षित व अधिक टिकाऊ बनाता है। सस्य क्रियाओं का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे नाशीकीटों के ऊपर एकीकृत एवं मित्र कीटों के ऊपर अनुकूल प्रभाव पड़े। इसके अन्तर्गत उचित किस्मों का चयन, बुवाई एवं रोपाई के समय में परिवर्तन, कीट-प्रपंच, फसल चक्र एवं अंत: फसलों का सही चुनाव आदि शामिल है।

अवरोधी एवं सहनशील किस्मों का उपयोग-

किसी क्षेत्र के नाशीकीट एवं मित्र कीटों की विविधता एवं सघनता के आधार पर अवरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव समन्वित कीट प्रबंधन की महत्वपूर्ण कड़ी है। इस प्रकार चयनित किस्मों में अपेक्षाकृत कीटों का प्रकोप कम होता है तथा रासायनिक दवाओं के उपयोग में भी कमी आती है। यह विधि सबसे सरल, सस्ती व दुष्प्रभाव रहित है।


ग्रीष्मकालीन जुताई-

गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करके सुषुप्ता अवस्था में पड़े कीड़ों को नष्ट करना एक प्रभावी नियंत्रण विधि है। फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करके फल मक्खी, कद्दू का लाल भृंग तथा कटुआ कीट के जीवन चक्र को नष्ट कर उनकी सक्रियता को कम किया जा सकता है।

अन्त: फसलीकरण-

सब्जियों की फसल के बीच में अन्त: फसलीकरण की क्रिया के द्वारा भी कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है। अन्त: फसलीकरण में लगाए गए भिन्न-भिन्न प्रकृति के पौधों द्वारा छोड़े जाने वाले जैव रसायन से कीटों के प्रौढ़ दूर भागते हैं तथा उनके द्वारा अण्डा देने की क्रिया भी कम हो जाती है। इस प्रकार के पौध रोपण प्रक्रिया से परभक्षी एवं परजीवी कीटों की क्रियाशीलता को बढ़ाती है। टमाटर एवं गोभी की अन्त: फसलीकरण से इन दोनों सब्जियों में कीट अकेले की अपेक्षा कम लगते हैं।

कीटों को आकर्षित करने वाली फसलों का उपयोग-

मुख्य फसल के साथ ऐसी फसलों को लगाना चाहिए, जिनको कीट मुख्य फसल की अपेक्षा अधिक पसंद करते हैं। आकर्षित करने वाली फसलों को मुख्य फसल में लगाकर बिना किसी रसायन के प्रयोग से मुख्य फसल को आसानी से कम लागत में उगाया जा सकता है। क्योंकि मुख्य फसल पर लगने वाले कीड़े आकर्षक फसलों पर आ जाते हैं, जिनको आसानी से नष्ट किया जा सकता है। गोभीवर्गीय फसलों को हरी सूड़ी एवं पर्ण जालक कीट के नियंत्रण के लिए सरसों का तथा टमाटर में लगने वाली फल छेदक कीट के रोकथाम के लिए गेंदे के फसल को आकर्षक फसल के रूप में प्रयोग करना चाहिए।

सब्जी में जैविक विधि से कीट नियंत्रण-]

समन्वित कीट प्रबंधन में जैविक नियंत्रण एक प्रमुख घटक है। किसी भी परिस्थिति में मित्र कीट एवं अन्य सूक्ष्म जीव मुख्यतया हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से सीमित रखने में सहायता करते हैं। जैविक नियंत्रण से इन्हीं कारकों का प्रभावी ढंग से समन्वित कीट प्रबंधन में प्रयोग होता है, तथा मित्र कीटों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। बहुत सारे परभक्षी व परजीवी कीट प्राकृतिक दशा में मित्र कीट के रूप में पाये जाते हैं, जो हानिकारक कीटों के विभिन्न अवस्थाओं को क्षति पहुंचाते हैं। एक हेक्टेयर टमाटर की फसल को फलछेदक कीट से रोकथाम के लिए 2,50,000 ट्राइकोग्रामा परजीवी कीट का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार क्राइसोपरला कारनिया नामक परभक्षी कीट को 50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से दस दिन के अन्तराल पर तीन बार छोडऩे से सफेद मक्खी, हरा फुदका, माहू आदि से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। कीटों के प्राकृतिक षत्रु को प्रयोगशाला में अधिक संख्या में उत्पादन कर, उसे सफलतापूर्वक, आवष्यकतानुसार फसलों पर छोड़कर विषैले रसायनों के उपयोग में कमी लायी जा सकती है।

सूक्ष्म जीव द्वारा फसलों की सुरक्षा-

सूक्ष्म जीव कीटनाशियों के अन्तर्गत जीवाणु, कवक और विषाणु का प्रयोग करके हानिकारक कीटों में रोग उत्पन्न कर उनका नियंत्रण किया जा सकता है। यह रोग हानिकारक कीड़ों में महामारी की तरह फैलता है जिससे कीड़े मर जाते हैं। सूक्ष्म कीटनाशियों में बी.टी. का प्रयोग व्यवहारिक स्तर पर किया जा रहा है। जिसके प्रयोग से गोभी का हीरक पृष्ठ कीट, भिण्डी का तना एवं फल छेदक कीट, टमाटर का फल बेधक कीटों का नियंत्रण संभव हुआ है।

यांत्रिक विधि से कीटों का नियंत्रण-

कुछ कीट जिनको आसानी से देख जा सके उन्हें पकड़कर मार देना चाहिए। हड्डा बीटल, तम्बाकू की सूड़ीं के अण्डे तथा तना व फल को भेदकर खाने वाली सूड़ीं (बैगन व भिण्डी के फल छेदक कीट) को बहुत आसानी से देखकर कीट की विभिन्न अवस्थाओं को नष्ट कर देने से इनसे होने वाली क्षति से बचा जा सकता है। कीट नियंत्रण की इस विधि में लागत कम आती है एवं यह विधि सुरक्षित भी है।

व्यवहारिक नियंत्रण-

इस विधि के अन्तर्गत प्रौढ़ कीटों को फेरोमोन का प्रयोग कर भ्रमित किया जाता है। सब्जियों में मुख्य रूप से बैगन का तना व फल बेधक, तम्बाकू की सूंड़ी, टमाटर का फल बेधक एवं फल मक्खी को फेरोमोन द्वारा आकृष्ट कर नियंत्रण किया जा सकता है।
रसायनों का सुरक्षित एवं आवश्यक मात्रा का प्रयोग- रसायनों का अनियमित और अत्यधिक प्रयोग करने से कीटों में प्रतिरोधी क्षमता का विकास हो जाता है। साथ ही हानिकारक रासायनिक अवशेषों की वातावरण में वृद्धि होती है। समन्वित कीट प्रबंधन में यदि दूसरे कारकों के साथ सही संतुलन बनाकर सुरक्षित रसायनों की सही मात्रा एवं उचित अंतराल पर छिड़काव किया जाय तो कीटनाशी रसायन बहुत प्रभावी होता है। विभिन्न कीटनाशियों का अलग-अलग प्रतीक्षाकाल होता है। इसलिए दवा छिड़कने के बाद प्रतिक्षाकाल के बाद फल की तुड़ाई करने से रासायनिक अवयवों के अवषेष नहीं रहते हैं।

Monday, 8 October 2018

October 08, 2018

कैसे करें आम की खेती



परिचय
आम की खेती लगभग पूरे देश में की जाती हैI यह मनुष्य का बहुत ही प्रीय फल मन जाता है इसमे खटास लिए हुए मिठास पाई जाती हैI जो की अलग अलग प्रजातियों के मुताबिक फलो में कम ज्यादा मिठास पायी जाती हैI कच्चे आम से चटनी आचार अनेक प्रकार के पेय के रूप में प्रयोग किया जाता हैI इससे जैली जैम सीरप आदि बनाये जाते हैI यह विटामीन ए व् बी का अच्छा श्रोत हैI


जलवायु और भूमि

आम की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है?
आम की खेती उष्ण एव समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती हैI आम की खेती समुद्र तल से 600 मीटर की ऊँचाई तक सफलता पूर्वक होती है इसके लिए 23.8 से 26.6 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान अति उतम होता हैई आम की खेती प्रत्येक किस्म की भूमि में की जा सकती हैI परन्तु अधिक बलुई, पथरीली, क्षारीय तथा जल भराव वाली भूमि में इसे उगाना लाभकारी नहीं है, तथा अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि सवोत्तम मानी जाती हैI

प्रजातियाँ

आम के पेड़ लगाने से पहले वो कौन-कौन सी उन्नतशील प्रजातियाँ है?
हमारे देश में उगाई जाने वाली किस्मो में, दशहरी, लगडा, चौसा, फजरी, बाम्बे ग्रीन, अलफांसो, तोतापरी, हिमसागर, किशनभोग, नीलम, सुवर्णरेखा,वनराज आदि प्रमुख उन्नतशील प्रजातियाँ हैI

गड्डों की तैयारी में सावधानियाँ

आम की फसल तैयार करने के लिए गढ्ढ़ो की तैयारी किस तरह से करे और वृक्षों का रोपण करते समय किस तरह की सावधानी बरते?
वर्षाकाल आम के पेड़ो को लगाने के लिए सारे देश में उपयुक्त माना गया हैI जिन क्षेत्रो में वर्षा आधिक होती है वहां वर्षा के अन्त में आम का बाग लगाना चाहिएI लगभग 50 सेन्टीमीटर व्यास एक मीटर गहरे गढ्ढे मई माह में खोद कर उनमे लगभग 30 से 40 किलो ग्राम प्रति गड्ढा सड़ी गोबर की खाद मिटटी में मिलाकर और 100 किलोग्राम क्लोरोपाइरिफास पावडर बुरककर गड्ढो को भर देना चाहिएI पौधों की किस्म के अनुसार 10 से 12 मीटर पौध से पौध की दूरी होनी चाहिए, परन्तु आम्रपाली किस्म के लिए यह दूरी 2.5 मीटर ही होनी चाहिएI

प्रवर्धन या प्रोपोगेशन

आम की फसल में प्रवर्धन या प्रोपोगेशन किन- किन विधियो दवारा किया जा सकता है?
आम के बीजू पौधे तैयार करने के लिए आम की गुठलियों को जून-जुलाई में बुवाई कर दी जाती है आम की प्रवर्धन की विधियों में भेट कलम, विनियर, साफ्टवुड ग्राफ्टिंग, प्रांकुर कलम, तथा बडिंग प्रमुख है, विनियर एवम साफ्टवुड ग्राफ्टिंग द्वारा अच्छे किस्म के पौधे कम समय में तैयार कर लिए जाते हैI

खाद एवं उर्वरक

आम की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग कब करना चाहिए ?
बागो की दस साल की उम्र तक प्रतिवर्ष उम्र के गुणांक में नाइट्रोजन, पोटाश तथा फास्फोरस प्रत्येक को १०० ग्राम प्रति पेड़ जुलाई में पेड़ के चारो तरफ बनायीं गयी नाली में देनी चाहिएI इसके अतिरिक्त मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार हेतु 25 से 30 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद प्रति पौधा देना उचित पाया गया हैI जैविक खाद हेतु जुलाई-अगस्त में 250 ग्राम एजोसपाइरिलम को 40 किलोग्राम गोबर की खाद के साथ मिलाकर थालो में डालने से उत्पादन में वृदि पाई गयी हैI

सिंचाई का समय

आम की फसल सिचाई हमें कब करनी चाहिए, और किस प्रकार करनी चाहिए?
आम की फसल के लिए बाग़ लगाने के प्रथम वर्ष सिचाई 2-3 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए 2 से 5 वर्ष पर 4-5 के अन्तराल पर आवश्यकताअनुसार करनी चहियेI तथा जब पेड़ो में फल लगने लगे तो दो तीन सिचाई करनी अति आवश्यक हैI आम के बागो में पहली सिचाई फल लगने के पश्चात दूसरी सिचाई फलो का काँच की गोली के बराबर अवस्था में तथा तीसरी सिचाई फलो की पूरी बढवार होने पर करनी चाहिएI सिचाई नालियों द्वारा थालो में ही करनी चाहिए जिससे की पानी की बचत हो सकेI

गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण

आम की फसल में निराई गुड़ाई और खरपतवारो का नियंत्रण हमारे किसान भाई किस प्रकार करे?
आम के बाग को साफ रखने के लिए निराई गुड़ाई तथा बागो में वर्ष में दो बार जुताई कर देना चाहिए इससे खरपतवार तथा भूमिगत कीट नष्ट हो जाते है इसके साथ ही साथ समय समय पर घास निकलते रहना चाहिएI

रोग और नियंत्रण

आम की फसल में कौन कौन से रोग लगते है और उसका नियंत्रण हम किस प्रकार करें?
आम के रोगों का प्रबन्धन कई प्रकार से करते हैI जैसे की पहला आम के बाग में पावडरी मिल्ड्यू यह एक बीमारी लगती है इसी प्रकार से खर्रा या दहिया रोग भी लगता है इनसे बचाने के लिए घुलनशील गंधक 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में या ट्राईमार्फ़ 1 मिली प्रति लीटर पानी या डाईनोकैप 1 मिली प्रति लीटर पानी घोलकर प्रथम छिडकाव बौर आने के तुरन्त बाद दूसरा छिडकाव 10 से 15 दिन बाद तथा तीसरा छिडकाव उसके 10 से 15 दिन बाद करना चाहिए आम की फसल को एन्थ्रक्नोज फोमा ब्लाइट डाईबैक तथा रेडरस्ट से बचाव के लिए कापर आक्सीक्लोराईड 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अन्तरालपर वर्षा ऋतु प्रारंभ होने पर दो छिडकाव तथा अक्टूबर-नवम्वर में 2-3 छिडकाव करना चाहिएI जिससे की हमारे आम के बौर आने में कोइ परेशानी न होI इसी प्रकार से आम में गुम्मा विकार या माल्फर्मेशन भी बीमारी लगती है इसके उपचार के लिए कम प्रकोप वाले आम के बागो में जनवरी फरवरी माह में बौर को तोड़ दे एवम अधिक प्रकोप होने पर एन.ए.ए. 200 पी. पी. एम्. रसायन की 900 मिली प्रति 200 लीटर पानी घोलकर छिडकाव करना चहियेI इसके साथ ही साथ आम के बागो में कोयलिया रोग भी लगता हैI जिसको की किसान भाई सभी आप लोग जानते है इसके नियंत्रण के लिए बोरेक्स या कास्टिक सोडा 10 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिडकाव फल लगने पर तथा दूसरा छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए जिससे की कोयलिया रोग से हमारे फल ख़राब न हो सकेI

कीट और उनका नियंत्रण

कौन - कौन से कीट है, जो आम में लगते है, और उनका नियंत्रण किस प्रकार होना चाहिए?
आम में भुनगा फुदका कीट, गुझिया कीट, आम के छल खाने वाली सुंडी तथा तना भेदक कीट, आम में डासी मक्खी ये कीट हैI आम की फसल को फुदका कीट से बचाव के लिए एमिडाक्लोरपिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिडकाव फूल खिलने से पहले करते हैI दूसरा छिडकाव जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाये, तब कार्बरिल 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलकर छिडकाव करना चाहिएI इसी प्रकार से आम की फसल को गुझिया कीट से बचाव के लिए दिसंबर माह के प्रथम सप्ताह में आम के तने के चारो ऒर गहरी जुताई करे, तथा क्लोरोपईरीफ़ास चूर्ण 200 ग्राम प्रति पेड़ तने के चारो बुरक दे, यदि कीट पेड़ पर चढ़ गए हो तो एमिडाक्लोरपिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर जनवरी माह में 2 छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए तथा आम के छल खाने वाली सुंडी तथा तना भेदक कीट के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 0.5 प्रतिशत रसायन के घोल में रूई को भिगोकर तने में किये गए छेद में डालकर छेद बंद कर देना चाहिएI एस प्रकार से ये सुंडी ख़त्म हो जाती हैI आम की डासी मक्खी के नियंत्रण के लिए मिथाईलयूजीनाल ट्रैप का प्रयोग प्लाई लकड़ी के टुकडे को अल्कोहल मिथाईल एवम मैलाथियान के छः अनुपात चार अनुपात एक के अनुपात में घोल में 48 घंटे डुबोने के पश्चात पेड़ पर लटकाए ट्रैप मई के प्रथम सप्ताह में लटका दे तथा ट्रैप को दो माह बाद बदल देI

फलों को तोड़ने का समय

आम की फसल की तुड़ाई कब करनी चाहिए और किस प्रकार करनी चाहिए?
आम की परिपक्व फलो की तुड़ाई 8 से 10 मिमी लम्बी डंठल के साथ करनी चाहिए, जिससे फलो पर स्टेम राट बीमारी लगने का खतरा नहीं रहता हैI तुड़ाई के समय फलो को चोट व् खरोच न लगने दें, तथा मिटटी के सम्पर्क से बचायेI आम के फलो का श्रेणीक्रम उनकी प्रजाति, आकार, भार, रंग व परिपक्ता के आधार पर करना चाहिएI

उपज

आम की फसल से औसतन उपज कितनी प्राप्त कर सकते है?
रोगों एवं कीटो के पूरे प्रबंधन पर प्रति पेड़ लगभग 150 किलोग्राम से 200 किलोग्राम तक उपज प्राप्त हो सकती हैI लेकिन प्रजातियों के आधार पर यह पैदावार अलग-अलग पाई गयी हैI
October 08, 2018

My Story

मै गया ज़िला के डोभी ब्लॉक के केशापी गॉंव के एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ. हमारे पास 5 एकड़ जमीन थी जिससे प्रारम्भ में खेती कर के किसी तरह अपने संयुक्त परिवार का भरण पोषण करते थे. खेत से जो भी आमदनी होती थी उससे अपने संयुक्त परिवार का भरण पोषण बहुत मुश्किल से होता था . इसी क्रम में कुछ पैसे कमाने के ललक में ट्रक चालक के रूप में पंजाब , हरियाणा ,उतर प्रदेश इत्यादि जगहों पर गये तथा वहां पर कृषि कार्यों को देखा उन्ही स्थानों से प्रेरणा पाकर कृषि के प्रति रूचि लेते हुए सब्जी लगाना प्रारंभ किया |


इससे मेरी आय धीरे धीरे बढ़ने लगी | इसके बाद ये बागवानी की ओर भी इनका ध्यान गया तथा १ एकड़ में आम के पौधों को लगाया |इसके बाद कृषि कार्य में पूरी रूचि होने के कारन जिला कृषि कार्यालय,आत्मा तथा उद्यान कार्यालय के संपर्क में आये |कृषि विभाग तथा आत्मा के द्वारा इन्हें प्रशिक्षण हेतु पंतनगर,पूषा,झाँसी इत्यादी स्थानों पर भेजा गया |इसके बाद उपरोक्त स्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त कर कृषि में पूर्ण रूप से परिवार सहित लग गये |आज मेरे द्वारा अपनी भूमि का एक-एक इंच को कृषि कार्य हेतु उपयोग किया जा रहा है| इनके पास गोबर गैस प्लांट, वर्मी कम्पोस्ट इकाई उपलब्ध है| साथ ही साथ आम का बहुत बड़ा बगीचा है इनके पास उन्नत कृषि यन्त्र पावर टिलर, नेपसेक, पावर स्प्रेयर इत्यादी उपलब्ध है |
इनके द्वारा वर्मी कम्पोस्ट का भी उत्पादन किया जा रहा है | कृषि विभाग के परामर्श से समेकित कृषि प्रणाली को अपनाया गया है | इनका रुझान अब मशरूम उत्पादन की ओर है | इस प्रकार मुश्किल से जीवन यापन करने वाला सलाना 50-60 हजार रूपये प्रति एकड़ का मुनाफा कमा रहे है | कृषि के क्षेत्र में ये इतनी जानकारी प्राप्त कर चुके हैं की आत्मा के सहयोग से किसान प्रक्षेत्र पाठशाला का संचालन भी इनके द्वारा किया जा रहा है| इस तरह इनका जीवन स्तर कृषि को अपनाकर काफी सुखी है तथा भविष्य में कृषि क्षेत्र में काफी कुछ करने की तमन्ना हैं|
हमारे द्वारा अपनाई गयी समेकित कृषि प्रणाली को देखने के लिए माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केशापी गये और उनके खेतो का भ्रमण किये| इशी दौरान माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने लिखा की

माननीय मुख्यमंत्री के निर्देश पर 23 फ़रवरी को कृषि उत्पादन आयुक्त, प्रधान सचिव पशूपालन,मत्स्य एवं सहकारिता, प्रधान सचिव योजना वो.स.डी. पंचायती राज के साथ-साथ जिला पदाधिकारी, निदेशक बामेती एवं स्थानीय पदाधिकारी ने इनके द्वारा अपनाई जा रही कृषि तकनीकों को देखा एवं सराहा |



Tuesday, 7 August 2018

August 07, 2018

टमाटर की खेती

आदर्श तापमान

टमाटर की फसल पाला नहीं सहन कर सकती है। इसकी खेती हेतु आदर्श तापमान 18. से 27 डिग्री से.ग्रे. है। 21-24 डिग्री से.ग्रे तापक्रम पर टमाटर में लाल रंग सबसे अच्छा विकसित होता है। इन्हीं सब कारणों से सर्दियों में फल मीठे और गहरे लाल रंग के होते हैं। तापमान 38 डिग्री से.ग्रे से अधिक होने पर अपरिपक्व फल एवं फूल गिर जाते हैं।

भूमि

उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि जिसमे पर्याप्त मात्रा मे जीवांश उपलब्ध हो।


टमाटर की किस्में

देसी किस्म-पूसा रूबी, पूसा-120,पूसा शीतल,पूसा गौरव,अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली
संकर किस्म-पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड-4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस.440 आदि।

बीज की मात्रा और बुवाई

बीजदर
एक हेक्टयेर क्षेत्र में फसल उगाने के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु लगभग 350 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। संकर किस्मों के लिए बीज की मात्रा 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है।
बुवाई
वर्षा ऋतु के लिये जून-जुलाई तथा शीत ऋतु के लिये जनवरी-फरवरी। फसल पाले रहित क्षेत्रों में उगायी जानी चाहिए या इसकी पाल से समुचित रक्षा करनी चाहिए।

बीज उपचार

बुवाई पूर्व थाइरम/मेटालाक्सिल से बीजोपचार करें ताकि अंकुरण पूर्व फफून्द का आक्रमण रोका जा सके।

नर्सरी एवं रोपाई

  • नर्सरी मे बुवाई हेतु 1X 3 मी. की ऊठी हुई क्यारियां बनाकर फॉर्मल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन कर लें अथवा कार्बोफ्यूरान 30 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मिलावें।
  • बीजों को बीज कार्बेन्डाजिम/ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर 5 से.मी. की दूरी रखते हुये कतारों में बीजों की बुवाई करें। बीज बोने के बाद गोबर की खाद या मिट्‌टी ढक दें और हजारे से छिड़काव -बीज उगने के बाद डायथेन एम-45/मेटालाक्सिल से छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
  • 25 से 30 दिन का रोपा खेतों में रोपाई से पूर्व कार्बेन्डिजिम या ट्राईटोडर्मा के घोल में पौधों की जड़ों को 20-25 मिनट उपचारित करने के बाद ही पौधों की रोपाई करें। पौध को उचित खेत में 75 से.मी. की कतार की दूरी रखते हुये 60 से.मी के फासले पर पौधों की रोपाई करें।
  • मेड़ों पर चारों तरफ गेंदा की रोपाई करें। फूल खिलने की अवस्था में फल भेदक कीट टमाटर की फसल में कम जबकि गेदें की फलियों/फूलों में अधिक अंडा देते हैं।

उर्वरक का प्रयोग

20 से 25 मैट्रिक टन गोबर की खाद एवं 200 किलो नत्रजन,100 किलो फॉस्फोरस व 100किलो पोटाश। बोरेक्स की कमी हो वहॉ बोरेक्स 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करने से फल अधिक लगते हैं।

सिंचाई

सर्दियों में 10-15 दिन के अन्तराल से एवं गर्मियों में 6-7 दिन के अन्तराल से हल्का पानी देते रहें। अगर संभव हो सके तो कृषकों को सिंचाई ड्रिप इर्रीगेशन द्वारा करनी चाहिए।

मिट्‌टी चढ़ाना व पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)

टमाटर मे फूल आने के समय पौधों में मिट्‌टी चढ़ाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है। टमाटर की लम्बी बढ़ने वाली किस्मों को विशेष रूप से सहारा देने की आवश्यकता होती है। पौधों को सहारा देने से फल मिट्‌टी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सड़ने की समस्या नही होती है। सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद बांस या लकड़ी के डंडों में विभिन्न ऊॅचाईयों पर छेद करके तार बांधकर फिर पौधों को तारों से सुतली बांधते हैं। इस प्रक्रिया को स्टेकिंग कहा जाता है।

खरपतवार नियंत्रण

  • आवश्यकतानुसार फसलों की निराई-गुड़ाई करें। फूल और फल बनने की अवस्था मे निंदाई-गुड़ाई नही करनी चाहिए।
  • रासायनिक दवा के रूप मे खेत तैयार करते समय फ्लूक्लोरेलिन (बासालिन) या से रोपाई के 7 दिन के अंदर पेन्डीमिथेलिन छिड़काव करें।

प्रमुख कीट एवं रोग

प्रमुख कीट- हरा तैला, सफेद मक्खी, फल छेदक कीट एंव तम्बाकू की इल्ली
प्रमुख रोग-आर्द्र गलन या डैम्पिंग ऑफ, झुलसा या ब्लाइट, फल संडन

एकीकृत कीट एवं रोग नियंत्रण

  • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
  • पौधशाला की क्यारियॉ भूमि धरातल से ऊंची रखे एवं फोर्मेल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन करलें।
  • क्यारियों को मार्च अप्रैल माह मे पॉलीथीन शीट से ढके भू-तपन के लिए मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  • गोबर की खाद मे ट्राइकोडर्मा मिलाकर क्यारी में मिट्‌टी में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।
  • पौधशाला की मिट्‌टी को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से बुवाई के 2-3 सप्ताह बाद छिड़काव करें।
  • पौध रोपण के समय पौध की जड़ों को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल मे 10 मिनट तक डुबो कर रखें।
  • पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल पर चेपा, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के लिए 2 से ३ छिड़काव इमीडाक्लोप्रिड या एसीफेट के करें। माइट की उपस्थिति होने पर ओमाइट का छिड़काव करें।
  • फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली के लिए इन्डोक्साकार्ब या प्रोफेनोफॉस का छिड़काव ब्याधि के उपचार के लिए बीजोपचार, कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब से करना चाहिए। खड़ी फसल मेंं रोग के लक्षण पाये जाने पर मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब या ब्लाईटॉक्स का धोल बनाकर छिड़काव करें। चूर्णी फंफूद होने सल्फर धोल का छिड़काव करें।

फलों की तुड़ाई,उपज एवं विपणन

जब फलों का रंग हल्का लाल होना शुरू हो उस अवस्था मे फलों की तुड़ाई करें तथा फलों की ग्रेडिंग कर कीट व व्याधि ग्रस्त फलों दागी फलों छोटे आकार के फलों को छाटकर अलग करें। ग्रेडिंग किये फलों को केरैटे में भरकर अपने निकटतम सब्जी मण्डी या जिस मण्डी मे अच्छा टमाटर का भाव हो वहां ले जाकर बेचें। टमाटर की औसत उपज 400-500 क्विंटल/है. होती है तथा संकर टमाटर की उपज 700-800 क्विंटल/है. तक हो सकती है।
टमाटर की प्रति हेक्टेयर कृषि लागत व्यय (रुपये में)
क्र.
विवरण
मात्रा एवं दर प्रति इकाई
लागत (रु.)
1.
क.
ख.
भूमि की तैयारी
जुताई की संख्या
मजदूरों की संख्या
02, दर 500/- प्रति घंटा
06, दर 150/-
1000
900
2.
स.
ख.
खाद एवं उर्वरक
गोबर की खाद 10 टन, 2 वर्ष में एक बार
नत्रजन
फास्फोरस
पोटाश
(मृदा परीक्षण के अनुसार) मजदूरों की संख्या
1000/-प्रति टन,
200 किलोग्राम दर 12.40/-
100 किलोग्राम दर 32.70/-
100 किलोग्राम दर 19.88/-
20, दर 150/-
10000
2480
3270
1988
3000
3.
क.
पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)
बॉस एवं वायर
मजदूरों की संख्या
50, दर 150/-
31000
7500
4.क.
बीज की मात्रा
बुआई पर
मजदूरों की संख्या
200 ग्राम दर 400/10 ग्राम
15, दर 150/-
8000
2250
5.क.
सिंचाई संख्या
मजदूर
10
10 दर 150/-
5000
1500
6.
निंदाई
मजदूरों की संख्या
40 दर 150/-
6000
7.
फसल सुरक्षा
ट्रायजोफॉस
इमीडाक्लोप्रिड
एसीफेट
प्रोफेनोफॉस
मजदूरों की संख्या
2 बार, दर 450/-
2 बार, दर 200/-
2 बार, दर 160/-
2 बार, दर 500/-
16 दर 150/-
900
400
320
1000
2400
तुड़ाई (मजदूरों की संख्या)
40 दर 150/-
6000
कुल लागत
88158
कुल आय (औसतन पैदावार 600 क्विंटल प्रति हेक्टयर)
480000
शुद्ध लाभ
391842

Monday, 6 August 2018

August 06, 2018

जैविक खेती

जैविक खेती (Organic farming)
जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है
जैविक खेती, की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक भाइयों को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शकि्त का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है। मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौषि्टक आहार मिलता रहे, इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियाँ को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी।
कृषकों की दृष्टि से लाभ
* भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।
* सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है।
* रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।
*फसलों की उत्पादकता में वृद्धि।
पर्यावरण की दृष्टि से लाभ
* भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है।
*मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण मे कमी आती है।
*कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है।
*फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धिअंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।