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Monday, 8 October 2018

October 08, 2018

जैविक खेती (Organic Farming)


जैविक खेती प्राचीन भारतीय कृषि प्रणाली है और यह आधुनिक रसायन प्रधान युग में भी प्रासंगिक है। ‘पर्यावरण में स्वच्छता तथा प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखकर मृदा, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना, भूमि को स्वस्थ एवं सक्रिय रखकर दीर्घकालिक उत्पादन प्राप्त करने को ही जैविक खेती या प्राकृतिक खेती कहते है।’ इस पद्धति में उर्वरकों व रसायनों का कम-से-कम उपयोग किया जाता है, इसलिये यह सस्ती और टिकाऊ है तथा सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यावरण के अनुकूल है।


मृदा भौतिक माध्यम न होकर जैविक माध्यम है जिसकी सुरक्षा परमावश्यक है, टिकाऊ खेती से तात्पर्य प्राकृतिक एवं कृत्रिम वृद्धि निवेशों के ऐसे सम्भावित प्रबन्ध से है जिसके तहत प्राकृतिक स्रोतों की गुणवत्ता, वर्तमान व भविष्य में उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण के सन्तुलन को बनाए रखते हुए किया जाये। ऐसी तकनीकें जो लम्बे एवं कम समय तक दोनों दशाओं में अधिक सुदृढ़ एवं पर्यावरण सम्मत हो, वही टिकाऊ हो सकती है। प्राकृतिक स्रोत केवल भोजन, चारा, कपड़ा, ईंधन आदि ही नहीं देते बल्कि ये पर्यावरण सन्तुलन भी विभिन्न क्रियाओं द्वारा बनाये रखते हैं।

जैविक खेती ऐसी कृषि कार्यशाला है जो कि रसायनों के ऊपर निर्भरता को कम करती है। रासायनिक खेती की अपेक्षा सस्ती है क्योंकि इस पद्धति के अन्तर्गत वनस्पति व जीवों के द्वारा भूमि व भूमि तत्वों का उपयोग किया जाता है व भूमि के वनस्पति, प्राणी व अन्य जैविक वस्तुओं द्वारा बनी खाद भूमि को लौटाई जाती है।

अब भविष्य में देश की निर्बाध गति से बढ़ती जनसंख्या का पेट भर भोजन उपलब्ध कराने के लिये खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में स्थायित्व लाने के लिये सिमटते प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को अधिक तर्क संगत बनाने के साथ-साथ उनकी उपयोग क्षमता में भी सुधार लाना होगा। जैविक व कृषि पद्धतियों का प्रयोग कर खरपतवार, कीट व रोगों का नियंत्रण करना ताकि भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ मृदाक्षरण व जल ह्रास को रोकना टिकाऊ खेती या प्राकृतिक खेती ये एक दूसरे में पर्याय हैं। मृदा की उर्वरा शक्ति कार्बनिक पदार्थों के बेहतर प्रबन्धन से बढ़ाई जा सकती है।

विश्व व्यापार समझौते के अनुसार कृषक अब उन्हीं उत्पादों का निर्यात कर सकेंगे जो किसी प्रकार से प्रदूषित नही हो एवं केवल जैविक विधियों से ही उत्पादित हो और जो मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नही डालें। इस प्रकार जैविक खेती से जहाँ ग्रामीण स्तर की स्वच्छता बढ़ाई जा सकती है, वहीं खेतीहर मजदूरों, लघु, सीमान्त कृषकों की स्वमेव आमदनी बढ़ेगी तथा बाहरी आदान सामग्री खाद, बीज, दवा नहीं खरीदने पर लागत में कमी और मुनाफा अधिक होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा।

जैविक खेती के गुण


1. सरल, सस्ती, स्वावलम्बी और स्थायी है।
2. मृदा संरचना में अद्भुत सुधारक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की सन्तुलित पैदावार एवं भूमि की निरन्तरता बनाए रखती है।
3. प्रदूषण विहीन भूमि, जल, वायु एवं पर्यावरण से जन स्वास्थ्य को रोग-मुक्त रखती है।
4. ग्राम स्वावलम्बन पर आधारित स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा।
5. इसे अपनाना सम्भव है व उसकी आज के सन्दर्भ में आवश्यकता निर्विवाद है।
6. यह कृषि उत्पादन की वह कार्यशाला है जिसमें कई उपायों के मध्य समन्वय स्थापित किया जाता है।
7. इसे किसान भाई आसानी से अपना सकते हैं।
8. यह परम्परागत प्राचीन खेती है जिसे मध्य युग की कृषि पद्धति ने बिगाड़ दिया है जिसे पुनः स्थापित किया जाना है।
9. भूमि को बंजर होने से रोकना है।
10. इसमें रसायनों का उपयोग कम-से-कम होता है।
11. पर्यावरण पारिस्थितिकीय मित्र भी है।
12. जैविक खेती से वर्षा आधारित खेती में विपुल उत्पादन सम्भव है।
13. भारत की खाद्य समस्या का समाधान जैव पौध पोषण को मुख्य आधार बनाकर सम्भव है।
14. वर्षा आधारित व सिंचित कृषि में उत्पादकता बढ़ाना सम्भव है। यदि उत्पादन तकनीकी में परिवर्तन, जो कम खर्च व सदाबहार टिकाऊ तकनीकी पर आधारित है, को शीघ्रता से अपनाया जा सकता है।
15. कृषि की प्रत्येक योजना का लक्ष्य कृषि उत्पादन को स्थायित्व देने में जैविक खेती की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
16. इस प्रणाली में उत्पादन लागत कम की जा सकती है और उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है जिससे हमारा देश वैश्वीकरण के दौर में विश्व बाजार में प्रतियोगिता कर सकता है।

जैविक खाद


पादप अवशेष, पशु और मानव अवशिष्ट पदार्थ से बनी खादों को जैविक खाद कहते हैं। स्थूल कार्बनिक खादों में गोबर की खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद व सान्द्रित कार्बनिक खाद में खलियाँ, पशु जनित व मछली की खादें आती हैं। जैव उर्वरकों राइजोबियम नीली हरी शैवाल व फास्फोटिक बैक्टीरिया आते हैं।

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन का प्रमुख उद्देश्य


1. उर्वरकों की उपयोग क्षमता में वृद्धि करना।
2. फसलों की उत्पादकता बढ़ाना।
3. मृदा उर्वरता को बढ़ाना एवं उसे स्थिर रखना।
4. किसानों की सामाजिक तथा आर्थिक दशा को बदलना।
5. पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना।

जैविक खादों का मृदा गुणों पर प्रभाव

मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव


1. मृदा में जावांश स्तर में वृद्धि के कारण भुरभुरापन एवं वायु संचार में वृद्धि होती है।
2. मृदा की जलधारण एवं जल सोखने की क्षमता में सुधार (35-40 प्रतिशत) होता है।
3. मृदा ताप को भी नियंत्रित रखती है।
4. जडों का विकास अच्छा होने के कारण मृदा क्षरण की सम्भावना कम होती है।
5. मृदा दानेदार बनती है।
6. मृदा से जल ह्रास कम होता है।
7. मिट्टी की सुघटयता (Plasicity) तथा संसंजन (Cohesion) को घटाना है।
8. भू-क्षरण कम होता है।
9. चिकनी काली मिट्टी (Friable) भुरभुरा बनती है।

मृदा के रासायनिक गुणों पर प्रभाव


1. प्रमुख पोषक तत्वों (प्राथमिक पोषक तत्वों) की पूर्ति के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों, हारमोंस एवं एंटीबायोटिक्स की मात्रा भी प्राप्त होती है जो विशेष लाभकारी है।
2. ताजे कार्बनिक पदार्थ सड़ने पर साइट्रेट आक्सलेट ट्राइप्लेट व लैक्ट्रेट पैदा करते हैं। जो लौह व एल्युमीनियम को बाँधकर फॉस्फेट की उपलब्धता को बढ़ाते हैं।
3. पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने के कारण कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है।
4. मृदा में अनुपलब्ध तत्वों की उपलब्धता जीवांश में वृद्धि के कारण अपने आप बढ़ जाती है।
5. मिट्टी की उभय प्रतिरोधी क्षमता (Buffering Capacity) बढ़ती है।
6. अमोनियम आयन को अपने साथ संयुग्मित कर अमोनियम के निक्षालन (Leaching) को कम होता है।
7. मृदा के लवणीयता एवं क्षारीयता में सुधार होता है।
8. मृदा में घनापन अतिशोषण क्षमता (Cation adsorption Capacity) बढ़ती है।
9. मृदा में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम को विनिमय योग्य रूप में संचित रखती है।
10. इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश व गंधक कार्बनिक रूपों में पाये जाते है।
11. इनके अपघटन से जो अम्ल उत्पन्न होते है, वे खनिजों को घोलकर पोषक तत्वों को मुक्त करते हैं।

मृदा के जैविक गुणों पर प्रभाव


1. मृदा में लाभदायक जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
2. लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।
3. सूक्ष्म जीवों के लिये भोजन व ऊर्जा प्रदान करती है। ये सूक्ष्मजीव अमोनीकरण, नाइट्रीकरण, नाइट्रोजन यौगिकीकरण आदि से योग सम्पन्न करते हैं।
4. जीवाणु जटिल पदार्थों को विच्छेदित कर आयनिक रूप में पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
5. अनेक जीवाणु मृदा से पोषक तत्व लेकर पौधों को प्रदान करते हैं।

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन के प्रमुख घटक

जैविक खादों से पोषक तत्व प्रबन्धन


गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, गोबर गैस की खाद, खलियाँ की खाद, तालाब की मिट्टी की खाद, मुर्गी की खाद व पशु जनित खाद।

हरी खाद से पोषक तत्व प्रबन्धन


हरी खाद व फसल अवशेष प्रबन्धन।

जीवाणु उर्वरकों से पोषक तत्व प्रबन्धन


राईजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, नील हरित काई, एजोला, स्फुिरघोलक, सूक्ष्म जीवाणु, माइकोराइजा।

दलहन फसलों से पोषक तत्व प्रबन्धन


फसल चक्रों में दलहनों का समावेश अन्तरवर्ती खेती में दलहनों का समावेशन।


जैविक खाद प्रबन्धन


जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, गोबर गैस की खाद, खलियाँ, प्रेसमड, शीरा व पशुजनित खाद के बारे में विस्तृत विवरण यहाँ दिया जा रहा है। अन्य जैविक खाद जैसे कम्पोस्ट, वर्मीकमोस्ट, हरी खाद तथा जैव उर्वरकों के बारे में विस्तृत विवरण में दिया गया है।

1. गोबर की खाद


हमारे प्रदेश में अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र में ईंधन की कमी होने के कारण गोबर के कण्डे लाकर जलाते हैं और बहुमूल्य खाद नष्ट कर देते हैं। आज हमारा देश वैज्ञानिक दृष्टि से प्रगतिशील माना जाता है लेकिन गाँव में आज भी किसान बहुमूल्य खाद को आम रास्ता, घर के आसपास एवं खेत की मेड़ पर प्रतिदिन घर के कूडा-करकट व गोबर को खुले वातावरण में इकट्ठा करता है उसकी कोई उपयोगिता नहीं की जाती है। परिणामस्वरूप कुछ खाद तेज हवा से व जानवर निकलने से इधर-उधर बिखरकर नष्ट हो जाता है। खुले में पड़े रहने से तेज गर्मी के कारण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। वर्षा होने से जल में पोषक तत्व घुलकर बह जाते हैं। इस खुले पड़े खाद से वातावरण दूषित होता है और उसमें कई तरह के रोग भी फैलते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसान गोबर की खाद का उपयोग कैसे व कब करें से अनभिज्ञ है। किसान गर्मी के महीनों में गोबर की खाद को खेत में छोटे-छोटे ढेर के रूप में खेत में डाल देते हैं। लेकिन इस विधि से खाद का उपयोग करने से कोई लाभ नहीं होता है, क्योंकि तेज गर्मी के कारण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। गोबर की खाद में 50 प्रतिशत अंश पशुमूत्र से प्राप्त होता है लेकिन कोई भी किसान पशुमूत्र को इकट्ठा कर खाद के गड्ढे तक नहीं डालते। पशुओं के नीचे मिट्टी, भूसा, गन्ने की पत्ती व धान की पुआल का बिछावन करना चाहिए ओर बिछावन हर दूसरे और तीसरे दिन खाद के गड्ढे में पहुँचाना चाहिए।

खाद बनाने की विधि


किसान भाई गोबर को जमीन के ऊपर ढेर लगाकर इकट्ठा करते हैं और गोबर बनाने की यह विधि वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नही है अतः खाद बनाने के लिये आवश्यकतानुसार गड्ढे किसी ऊँचे स्थान पर खोद लेना चाहिए जहाँ पानी नही भरता हो। गड्ढे की गहराई 1.25 मीटर से अधिक नही रखें क्योंकि विघटन करने वाले जीवाणुओं को अधिक गहराई पर ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और सड़न प्रक्रिया सुचारू रूप से नहीं चलती है। गड्ढे की लम्बाई-चौड़ाई आवश्यकतानुसार 3x4 मीटर रखना चाहिए। गड्ढे का फर्श पक्का हो तो अच्छा रहता है, इससे पोषक तत्व रिसकर नीचे नहीं जा पाते। गड्ढा तैयार हो जाने पर उसमें मलमूत्र गोबर व बिछावन प्रतिदिन डालते रहना चाहिए। जब गड्डा भरकर भूमि से आधा मीटर ऊँचा हो जाये तो 15 सेमी. मिट्टी की मोटी तह से ढँक देना चाहिए। इस प्रकार 6 महीने में गोबर की खाद बनकर तैयार हो जाएगी। अच्छे गोबर की खाद में नाइट्रोजन (नत्रजन), स्फुर व पोटाश क्रमशः 0.5, 0.25 व 0.5 होती है। गोबर की खाद की गुणवत्ता बढ़ाने हेतु खाद प्रति टन 20 किग्रा फॉस्फोरस मिलाना चाहिए इससे खाद में अमोनिया के रूप में होने वाली हानि कम होगी तथा फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ेगी।

खाद डालने का समय


खेत में खाद काफी पहले डालने से उसका प्रभाव काफी कम हो जाता है। हवा व तेज धूप द्वारा पोषक तत्व नष्ट हो जाते है। लिचिंग द्वारा पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और कुछ पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में भूमि में स्थिर हो जाते हैं। अतः गोबर की खाद को फसल बोने से लगभग 2 सप्ताह पहले खेत में डालकर मिला देना चाहिए।

खाद की मात्रा


गोबर की खाद की मात्रा खाद की उपलब्धता, मिट्टी की किस्म, फसल, उसकी किस्म, वर्षा, नमी तथा किसान की खाद खरीदने की क्षमता पर निर्भर करती है। साधरणतः 10 टन प्रति एकड़ खाद फसलों के लिये तथा 20 टन प्रति एकड़ खाद सब्जियों के लिये पर्याप्त होती है।

2. घरेलू कचरे से खाद


आपने देखा होगा कि हमारे देश के कस्बों व शहरो में कचरा सफाई व निष्पादन की विकट समस्या है, यदि कचरा सफाई पर एक दिन भी ध्यान नहीं दिया गया तो कचरे के ढेर लग जाते हैं और स्थिति अत्यन्त भयानक होने लगती है क्योंकि कचरे के ढेर पर मक्खियाँ, मच्छर एवं अन्य हानिकारक कीटाणु पनपने लगते हैं जो रोग फैलाने में सहायक होते हैं। पेयजल भी प्रदूषित होने लगता है या सम्भावना बनी रहती है। गाँवों की स्थिति तो और भी खराब है, क्योंकि यहाँ पर कचरे के साथ पशु के मलमूत्र भी रास्ते व गलियों में फैले रहते हैं, सब्जियों व फलों के छिलके, अण्डों के छिलके, आम की गुठलियाँ, रसोई की जूठन, बासी रोटी, चावल, दाल, उबली चाय की पत्ती, आटे का छना हुआ चोकर, घर के बगीचे व आँगनबाड़ी से पेड़-पौधों की सड़ी पत्तियाँ, गोबर व पशु मूत्र आदि है। इस प्रकार के कचरों को जीवांश कचरा कहते हैं। निम्नलिखित प्रक्रियाओं द्वारा वर्मी (केंचुआ) खाद तैयार कर सकते हैं।

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की प्रक्रिया


वर्मी कम्पोस्ट बनाने हेतु मुख्य सामग्री घास, पत्तियाँ, रसोईघर की जूठन, सब्जियों के छिलके व गोबर हैं। घर के पिछवाड़े में ईंट-चूना की एक टंकी बनाएँ स्थान के अनुसार टंकी की लम्बाई 2 मीटर, ऊँचाई व चौड़ाई 1 मीटर रखें। टंकी के पेंदे में ईंट के टुकड़े, मध्यम आकार की मिट्टी एवं बजरी की 5 सेमी तह बनाएँ। यह जल निकास में सहायक होती है। इसके ऊपर 10 सेमी की दोमट मिट्टी की तह बिछाएँ इसके बाद ऊपर 5 किलो मिट्टी को पानी में घोलकर छिड़के। अपने क्षेत्र में उपलब्ध स्रोतों से 400-500 केंचुए इकट्ठे करके क्यारियों मे रख दें। बाजार में वर्मीकल्चर केंचुए भी उपलब्ध हैं, इसका भी उपयोग किया जा सकता है। ऊपर से भूसा, पेड़ों की पत्तियाँ, सब्जियों के छिलके, रसोईघर की जूठन इत्यादि बिछा दें। अब इसके ऊपर थोड़ा सा गोबर का पानी छिड़क कर इसे बड़े पत्ती या अनुपयोगी कागज, गत्ते आदि से ढँक दें। आवश्यकतानुसार समय-समय पर पानी का छिड़काव करें। एक माह पश्चात गत्ते, अखबार, हटाकर पुनः उपलब्ध जीवांश कचरे की 5-6 सेमी की तह एक दो दिन के अन्तराल से बिछाते रहें। प्रत्येक बिछावन के साथ उसे जल से सीचें। एक माह में पोषण पदार्थ जैसे- नत्रजन, स्फुर, पोटाश अन्य पोषक तत्व, वृद्धिवर्धक तत्व व रोग रोधक गुणों वाला वर्मीकम्पोस्ट उपलब्ध होता है। इस प्रकार की 2 मीटर लम्बी टंकी से दो माह में लगभग 65 किग्रा कम्पोस्ट उपलब्ध होता है। इस खाद को हमारे घर के बगीचे में, सब्जियों में, फल वृक्ष में, फूल के पौधों में, गमलों में या सजावट के पत्तीदार पौधों के लिये उपयोग कर सकते हैं। पौधों में जहाँ यह खाद देंगे वहाँ खाद के साथ केंचुओं के अंडे भी होंगे जिनसे बाद में केंचुए निकलकर अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं। नमी बनाए रखें और जैव कचरा पौधों की क्यारियों मे देते रहें इससे केंचुए उसे भी खाद में परिवर्तित करते रहेंगे। इस विधि से प्राप्त कम्पोस्ट के उपयोग से फल-फूल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं जो उच्च गुणवत्ता वाले होंगे। वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से पेड़ पौधों की कीट आदि जैसे हानिकारक कारकों के प्रति प्राकृतिक निरोधकता में वृद्धि होती है, अतः रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च में कटौती के साथ-साथ पौध संरक्षण कार्य हेतु कीट व्याधि रसायनों के उपयोग में भी कटौती सम्भव हो जाती है।

3. गोबर गैस स्लरी की खाद


गोबर गैस संयंत्र एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा स्थूल कार्बनिक अवशिष्टों से ज्वलनशील गैसों के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस गैस संयंत्र में पशुओं के गोबर और अन्य सैल्यूलोज युक्त सामग्रियों को कुछ दिनों के लिये अवायुवीय दशाओं अर्थात ऑक्सीजन के अभाव में सड़ने दिया जाता है। इन दशाओं में मुख्य रूप से मिथेन, हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण तैयार होता है। जिसका उपयोग खाना बनाने के लिये ईंधन और अन्य कार्यों के लिये किया जाता है। ऊर्जा प्राप्त करने के उपरान्त बचे अवशिष्ट पदार्थ से पोषक खाद प्राप्त होती है।

बायोगैस संयंत्र में गोबर की पाचन क्रिया के बाद 25 प्रतिशत ठोस पदार्थ का रुपान्तर गैस के रूप में होता है और 75 प्रतिशत ठोस पदार्थ का रुपान्तर खाद के रूप में होता है। 2 घनमीटर के गैस संयंत्र में जिसमें करीब 50 किलो गोबर प्रतिदिन एवं 18.25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता है, उस गोबर से नमीयुक्त करीब 9.2 टन बायोगैस स्लरी का खाद प्राप्त होता है।

यह खाद खेती के लिये अति उत्तम खाद होती है। इसमें नाइट्रोजन 1.5 से 2 प्रतिशत, फास्फोरस 1.0 प्रतिशत एवं पोटाश 1.0 प्रतिशत तक होता है। बायोगैस संयंत्र से जब स्लरी के रूप में खाद बाहर आता है तब जितना नाइट्रोजन गोबर में होता है उतना ही नाइट्रोजन स्लरी में होता है, परन्तु संयंत्र में पाचन क्रिया के दौरान कार्बन का रुपान्तर गैसों में होने से कार्बन की मात्रा कम होने से कार्बन नाइट्रोजन अनुपात कम हो जाता है व इससे नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी हुई प्रतीत होती है।

बायोगैस संयंत्र से निकली पतली स्लरी में 20 प्रतिशत नाइट्रोजन, अमोनिया के रूप में होता है। अतः यदि इसका तुरन्त उपयोग खेत में नालियाँ बनाकर अथवा सिंचाई के पानी में मिलाकर खेत में छोड़कर किया जाये तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरह से फसल पर तुरन्त होता है और उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़त हो सकती है। स्लरी खाद को सुखाने के बाद उसमें से नाइट्रोजन का कुछ भाग हवा में उड़ जाता है। यह खाद सिंचाई रहित खेती में एक हेक्टेयर में करीब 5 टन व सिंचाई वाली खेती में 10 टन प्रति हेक्टेयर मात्रा में डाला जाता है। बायोगैस स्लरी खाद में भी नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश इन मुख्य तत्वों के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषक तत्व एवं ह्ययूमस होता है जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होता है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्म जीवाणु बढ़ते हैं। इस खाद के उपयोग से भी अन्य जैविक खाद की तरह 3 वर्षों तक अन्य उपयोगी तत्व पसलों को उपलब्ध होते रहते हैं व एक बार खाद देने से 3 वर्ष तक अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है।

स्लरी का संग्रहण


यदि गोबर गैस संयंत्र घर के पास व खेत से दूर है तब पतली स्लरी का संग्रहण करने के लिये बहुत जगह लगती है व पतली स्लरी का स्थानान्तरण भी कठिन होता है ऐसी अवस्था में स्लरी को सुखाना अत्यन्त आवश्यक है। इसमें बायोगैस को निकास कक्ष से जोड़कर 2 घनमीटर के संयंत्र के लिये 1.65 मीटर X 0.6 मीटर X 0.5 मीटर के दो सीमेंट के टैंक बनाए जाते हैं इसके दूसरी तरफ छना हुआ पानी एकत्र करने हेतु एक पक्का गड्ढा बनाया जाता है। फिल्ट्रेशन टैंक के नीचे 15 सेमी. मोटाई का कचरा, कूड़ा-कचरा, हरा-कचरा इत्यादि डाला जाता है। इस पर निकास कक्ष से जब द्रव रूप की स्लरी गिरती है तब स्लरी का पानी कचरे के तह से छनकर नीचे गड्ढे में एकत्रित हो जाता है। इस तरह एकत्रित पानी बायोगैस संयंत्र में गोबर की भराई के समय डाला जाता है उसका 2/3 हिस्सा गड्ढे में पुनः एकत्रित हो जाता है। इसे गोबर के साथ मिलाकर पुनः संयंत्र में डालने से गैस उत्पादन बढ़ जाता है इसके अलावा इसमें सभी पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में होते हैं। अतः इसका छिड़काव पौधों पर करने से पौधों का विकास अच्छा होता है, कीड़े मरते हैं एवं फसल में वृद्धि होती है। करीब 15-20 दिन में पहला टैंक भर जाता है तब इस टैंक को ढँककर स्लरी का निकास दूसरे टैंक में खोल दिया जाता है। जब तक दूसरा टैंक स्लरी से भरता है तब पहले टैंक में स्लरी सूख जाती है व 25-30 प्रतिशत नमी वाला खाद टैंक से बाहर निकाल लिया जाता है। इसका भण्डारण अलग से गड्ढे में किया जाता है अथवा इसको बैलगाड़ी में भरकर खेत तक पहुँचाना आसान होता है।

फिल्ट्रेशन टैंक की मदद से बायोगैस की स्लरी का अधिक संग्रहण किया जा सकता है व फिल्ट्रेट पानी के बाहर निकलने व उसका संयंत्र में पुनः उपयोग करने से पानी की भी बचत होती है।

इस प्रकार बायोगैस संयंत्र से बायोगैस द्वारा ईंधन की समस्या का समाधान हो ही जाता है। साथ में स्लरी के रूप में उत्तम खाद भी खेती के लिये प्राप्त होता है। अतः बायोगैस संयंत्र से किसान को दोबारा लाभ मिलता है।

गोबर गैस के मुख्य लाभ


1. कार्बनिक-अवशिष्टों से बने पोषक तत्वों की हानि से ईंधन गैस और खाद प्राप्त होती है, इससे जलाने की लकड़ी में बचत होती है।
2. संयंत्र पूरी तरह से स्वास्थ्यप्रद और शुद्ध दशाओं में कार्य करता है। इससे गन्दी महक नहीं आती। मक्खियों और मच्छरों का जनन रुक जाता है।
3. कम्पोस्ट विधि की तुलना में इस विधि में नाइट्रोजन की हानि बहुत कम होती है।

4. खलियों के खाद


हमारे देश में अनेक किस्म की खलियाँ तैयार की जाती हैं जिनका इस्तेमाल सान्द्रित कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है। इसमें पोषक तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। मूँगफली की खली, तिल की खली, सरसों की खली जिसका इस्तेमाल जानवरों के आहार के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग खाद के रूप में नहीं करना चाहिए। अन्य अखाद्य खलियाँ जैसे- अरण्डी की खली, नीम की खली, करंज की खली जो कि विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति के कारण पशु आहार के लिये उपयुक्त नहीं होती, उनका खाद के रूप में उपयोग लाभदायक रहता है। खलियों में नाइट्रोजन की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है।

खलियों में पाई जाने वाली नाइट्रोजन का 70-80 प्रतिशत मात्रा पौधों को शीघ्र प्राप्त होता है किन्तु इन्हें फसल की बुआई के 15-25 दिन पहले उपयोग करना चाहिए। उपयोग करने से पूर्व इन्हें अच्छी तरह पाउडर के रूप में बना लेना चाहिए, ताकि इनका एक साथ इस्तेमाल किया जा सके। लम्बे समय की फसल जैसे गन्ना में इनका उपयोग खड़ी फसल में भी कर सकते हैं। सामान्य तौर पर 10-30 क्वि./हे. खलियों का उपयोग कर सकते हैं। वैसे तो खलियों की मात्रा फसल, भूमि का प्रकार, जलवायु तथा खली की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

5. मुर्गी की खाद


मुर्गी की खाद मे 1/3 भाग बीट, 1/3 भाग दाना, भूसा व पेशाब आदि का मिश्रण होता है, उसमें 1.1 प्रतिशत नत्रजन, 1.5 प्रतिशत स्फुर व 1.6 प्रतिशत पोटाश तत्व के अतिरिक्त अन्य आवश्यक तत्व कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन व सोडियम भी पाये जाते हैं। इस खाद से पौधों में रोगरोधी क्षमता में वृद्धि होती है। 100 अंडे देने वाली मुर्गियों से एक वर्ष में 4 टन मुर्गी खाद प्राप्त होती है, जबकि मांस हेतु 100 मुर्गियों से 1 वर्ष में 1 टन खाद प्राप्त होती है। उपयोग के समय मृदा में पर्याप्त नमी हो व अन्य जीवांश खादों के साथ मिलाकर 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

6. पशुजनित खादें


पशु जनित उत्पाद का खाद के रूप में भी इस्तेमाल होता है। इसमें पशु कंकाल से तैयार खाद या भूचड़खाने से प्राप्त पदार्थ जैसे- शुष्क रक्त, मांस की खाल, सींग व खुर की खाद आदि सर्वाधिक प्रचलित है। शुष्क रक्त या रक्त की खाद में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है और यह शीघ्र कारगर होती है और सभी फसलों पर लाभकारी होती है। इनका उपयोग खलियों की भाँति ही करना चाहिए। मछली भोजन के रूप में पाई जाती है। नाइट्रोजन के अलावा इसमें एक अच्छे अनुपात में फॉस्फोरस भी पाया जाता है। मछली की खाद से पोषक तत्वों की पूर्ति शीघ्र होती है और इनका उपयोग सभी फसलों में किया जा सकता है। पक्षियों द्वारा विसर्जित मल-मूत्र, मैला आदि पशु और मानव जनित अवशिष्ट पदार्थों की श्रेणी में आते हैं।

7. तालाब की सड़ी मिट्टी की खाद


पुराने तालाब की सड़ी मिट्टी का प्रयोग जीवांश खाद के स्रोत के रूप में किया जा सकता है जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ उर्वरता में भी सुधार आता है। वर्षा ऋतु में शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की सभी भूमियों से जल बहकर तालाबों में इकट्ठा होता है। पानी के साथ-साथ मल-मूत्र, खेतों के उर्वर अंश, पशु तथा पौधों के अवशेष भी तालाबों में एकत्रित होते रहते हैं। जब पानी कुछ स्थिर हो जाता है, तो घुलित मिट्टी आदि व अन्य पदार्थ नीचे पेंदी में बैठ जाते हैं। पेंदी में बैठी ऐसी मिट्टी को तालाब मिट्टी खाद अथवा टैंकेज कहते हैं। तालाबों की सतह की 12 इंच मोटी मिट्टी अधिक उर्वरक होती है। इस मिट्टी में 1.0 से 4.0 प्रतिशत तक नमी पाई जाती है तथा स्फुर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। तालाब की मिट्टी की खाद का खेत में 25-30 टन प्रति हेक्टेयर उपयोग किया जा सकता है।
October 08, 2018

वर्मी कम्पोस्ट (vermicompost)

केंचुओं की मदद से कचरे को खाद में परिवर्तित करने हेतु केंचुओं को नियंत्रित वातावरण में पाला जाता है। इस क्रिया को वर्मीकल्चर कहते हैं, केंचुओं द्वारा कचरा खाकर जो कास्ट निकलती है उसे एकत्रित रूप से वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं।

केंचुओं का महत्त्व


केंचुआ कृषि में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान भूमि सुधार के रूप में देता है। इनकी क्रियाशीलता मृदा में स्वतः चलती रहती है। प्राचीन समय में प्रायः भूमि में केंचुए पाये जाते थे तथा वर्षा के समय भूमि पर देखे जाते थे। परन्तु आधुनिक खेती में अधिक रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के लगातार प्रयोगों से केंचुओं की संख्या में भारी कमी आई है। जिस भूमि में केंचुए नहीं पाये जाते हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि मिट्टी अब अपनी उर्वरा शक्ति खो रही है तथा उसका ऊसर भूमि के रूप में परिवर्तन हो रहा है।

केंचुआ मिट्टी में पाये जाने वाले जीवों में सबसे प्रमुख है। ये अपने आहार के रूप में मिट्टी तथा कच्चे जीवांश को निगलकर अपनी पाचन नलिका से गजारते हैं जिससे वह महीन कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाते हैं और अपने शरीर से बाहर छोटी-छोटी कास्टिग्स के रूप में निकालते हैं। इसी कम्पोस्ट को वर्मी कम्पोस्ट कहा जाता है। केंचुओं का प्रयोग कर व्यापारिक स्तर पर खेत पर ही कम्पोस्ट बनाया जाना सम्भव है। इस विधि द्वारा कम्पोस्ट मात्र 45 दिन में तैयार हो जाता है।

केंचुओं का पालन ‘कृमि संवर्धन‘ या ‘वर्मी कल्चर’ कहलाता है। अब तक केंचुओं की 4500 प्रजातियों विश्व के विभिन्न भागों में बताई जा चुकी हैं। केंचुए दो प्रकार के हैं- जलीय व स्थलीय।

आज केंचुओं की कुछ ऐसी प्रजातियाँ विकसित कर ली गई हैं जिनको पालकर आप प्रतिदिन के कूड़ा-करवट को अच्छी खाद ‘वर्मी कम्पोस्ट’ में बदल सकते हैं। यह खाद इतनी शक्तिशाली होती है कि इसमें पौधों द्वारा चाहे गए कभी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं तथा पौधे इनको तुरन्त ग्रहण कर लेते हैं।

वर्मी कल्चर


वर्मीकल्चर लकड़ी के बॉक्स, प्लास्टिक के क्रेट, प्लास्टिक की बाल्टी अथवा ईंट व सीमेंट के छोटे टैंक में किया जा सकता है। यह एक कम गहरे गड्ढे में भी किया जा सकता है। वर्मीकल्चर के लिये 20 लीटर क्षमता की बाल्टी अथवा 45 सेमी.X45 सेमी.X30 सेमी. का लकड़ी का डिब्बा लिया जा सकता है। यदि गड्ढे अथवा टैंक में वर्मी कल्चर किया जाना है तो वह छायादार जगह में होना चाहिए और उस स्थान पर पानी एकत्र नहीं होना चाहिए।

वर्मीकल्चर हेतु उपयुक्त पात्र का चुनाव करने के बाद उसमें छोटे-छोटे छिद्र कर दिये जाते हैं ताकि उससे अतिरिक्त बाहर पानी निकल जाये। इसके बाद पात्र में वर्मी बैड तैयार किया जाता है। वर्मी बैड में सबसे नीचे वाले परत में छोटे-छोटे पत्थर ईंट के टुकड़े व मोटी रेत 3.5 सेमी. की मोटाई तक डाली जाती है। ताकि पानी का वहन ठीक प्रकार से हो। इसके बाद इसमें मिट्टी का एक परत दिया जाता है जो कम-से-कम 15 सेमी. मोटाई का होना चाहिए। फिर इसे अच्छी तरह गीला किया जाता है। 

यदि सिर्फ एपीजेइक जाति अथवा एक्सोटिक केंचुए पाले जा रहे हैं तो मिट्टी के मोटे परत की आवश्यकता नहीं है, पर जब एपीजेइक और एनेसिक दोनों जाति के केंचुए एक साथ पाले जाते हैं तब मिट्टी का परत आवश्यक है। इसके लिये अपने आस-पास के परिसर से एकत्र किये गए करीब 100 केंचुए मिट्टी के परत में छोड़ दिये जाते हैं। इसके ऊपर ताजे गोबर के छोटे-छोटे लड्डू जैसे बनाकर रख दिये जाते हैं। 

अब पूरे बॉक्स को लगभग 10 सेमी. मोटे सूखे कचरे की तह से ढँक दिया जाता है। इस प्रकार बने वर्मीबैड को जूट की थैली के आवरण से ढँक दिया जाता है। इस पर थोड़ा पानी छिड़क कर गीला किया जाता है। बहुत अधिक पानी डालना आवश्यक नहीं है। इस प्रकार 30 दिन तक वर्मीबैड में नमी रखना है और उसकी पक्षियों, मुर्गियों, मेंढक आदि से रक्षा करनी है। इस समय में केंचुओं का विकास और प्रजनन होता है।

केंचुओं को भोजन देना


30 दिन बाद 31वें दिन वर्मीबैड में थोड़ा-थोड़ा जैविक कचरा समान रूप से फैला सकते है कचरे की तह की मोटाई 5 सेमी से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए, अन्यथा कचरे के सड़ने से जो गर्मी उत्पन्न होगी उससे केंचुओं को नुकसान हो सकता है। एक सप्ताह में दो बार कचरा वर्मीबैड पर डाला जा सकता है। इस समय भी वर्मीबैड में 50-50 प्रतिशत नमी बनाए रखना आवश्यक है। 30 दिन तक इस प्रकार केंचुओं को भोजन देते हैं। 30 दिन बाद भोजन देना बन्द कर दें और केंचुओं के बॉक्स को ढँककर रख दें। ढँक कर रखना केंचुओं की सुरक्षा के लिये अनिवार्य है पर इस तरह से ढँके कि बॉक्स में हवा का वहन ठीक प्रकार से होता रहे।

खाद निकालना


भोजन देने के 30-40 दिन बाद केंचुओं द्वारा पूर्ण जैविक पदार्थ/कचरा काले रंग के दानेदार वर्मीकास्ट में बदल जाता है। वर्मीकम्पोस्ट, वर्मीकास्ट एवं पूर्णतः सड़े हुए कचरे की खाद का मिश्रण होता है। वर्मीकम्पोस्ट बन जाने के बाद केंचुओं के कल्चर बॉक्स में पानी देना बन्द कर दिया जाता है। नमी की कमी की वजह से केंचुए बॉक्स में नीचे की ओर चले जाते हैं, इस समय खाद को ऊपर से निकालकर अलग से एक पॉलिथीन पर छोटे ढेर के रूप में निकाल लिया जाता है। इस ढेर को भी थोड़ी देर धूप में रखा जाता है ताकि केंचुए नीचे की ओर चले जाएँ। ऊपर का कम्पोस्ट अलग कर लिया जाता है। नीचे के कम्पोस्ट को केंचुओं सहित पुनःकल्चर बॉक्स में डालकर दूसरा चक्र शुरू कर दिया जाता है।

अधिक मात्रा में केंचुआ खाद का निर्माण


कल्चर बॉक्स में केंचुए को बढ़ाने के बाद अधिक मात्रा में कचरे का उपयोग करके वर्मीकम्पोस्ट बनाया जा सकता है इसके लिये एपीजेइक किस्म के केंचुए उपयोग में लाये जा सकते हैं।

अधिक मात्रा में खाद बनाने के लिये सर्वप्रथम छायादार स्थान का चुनाव करना आवश्यक है। यदि खेत अथवा बाग-बगीचे में छायादार वृक्षों की कतारें है तो उनके नीचे केंचुआ खाद के लिये वर्मीबैड बनाए जा सकते हैं। अन्यथा खेत के किनारे पर 6-8 फीट ऊँचे बाँस अथवा डंडे गाड़कर ऊपर घास का छप्पर डालकर कृत्रिम शेड बनाया जा सकता है। अधिक मात्रा में खाद बनाने के लिये वर्मीबैड की चौड़ाई 3 फीट से अधिक एवं ऊँचाई 1 फीट से अधिक नहीं होनी चाहिए। लम्बाई स्थान एवं कचरे की उपलब्धता के आधार पर कितनी भी हो सकती है किन्तु वर्मीबैड बनाने का स्थान धरातल से थोड़े ऊँचाई वाले स्थान पर होना चाहिए ताकि आस-पास का पानी उसमें एकत्र न हो सकें।

वर्मीबैड बनाना


जमीन पर वर्मीबैड बनाने के लिये सर्वप्रथम सूखी डंठलों एवं कचरे को बैड की लम्बाई-चौड़ाई के आकार में बिछा दें। इस पर सब प्रकार के मिश्रित कचरे, जिसमें सूखा कचरा, हरा कचरा, किचन वेस्ट, घास, राख इत्यादि मिश्रित हो, उसकी करीब 4 इंच मोटी परत बिछा दें। इस पर अच्छी तरह पानी देकर उसे गीला कर दें। इसके ऊपर सड़ा हुआ अथवा सूखे गोबर के खाद की 3-4 इंच मोटी परत बिछा दें। इसे भी पानी से गीला कर दें। 

पानी का हल्का-हल्का छिड़काव करना है बहुत अधिक पानी डालना आवश्यक नहीं। इस पर 1 वर्गमीटर में 100 के हिसाब से स्थानीय अथवा एक्सोटिक प्रजाति के जो भी केंचुए उपलब्ध हो वे छोड़े जा सकते हैं। इसके ऊपर पुनः हरी पत्तियों का 2-3 इंच पतला परत देकर पूरे वर्मीबैड को सूखी घास अथवा टाट की बोरी से ढँक दिया जाता है। मेंढक, मुर्गियों अथवा अन्य पक्षियों एवं लाल चीटिंयों से वर्मीबैड को बचाना आवश्यक है।

इस प्रकार वर्मीबैड बनाने के बाद पुनः कचरा डालने की आवश्यकता नहीं है। इस वर्मीबैड से कुछ दूरी पर इसी तरह कचरा एकत्र करके दूसरा वर्मीबैड तैयार कर सकते हैं। करीब 40-60 दिन बाद जब पहले वर्मीबैड खाद तैयार हो जाता है, तब उसमें पानी देना बन्द कर देते हैं व कल्चर बॉक्स की तरह ही इसमें से धीरे-धीरे ऊपर का खाद निकाल लिया जाता है। नीचे की तह खाद जिसमें सारे केंचुए होते हैं उसे दूसरे वर्मीबैड पर डाल दिया जाता है ताकि उसमें वर्मीकम्पोस्ट की क्रिया आरम्भ हो जाये। ताजे निकाले गए वर्मीकम्पोस्ट के ढेर को भी वर्मीबैड के नजदीक ही रखा जाता है व उसमें पानी देना बन्द कर देते हैं। नमी की कमी की वजह से उसमें से केंचुए धीरे-धीरे नजदीक के वर्मीबैड में चले जाते हैं वर्मीकम्पोस्ट खेत में डालने के लिये तैयार हो जाता है। इस खाद में जो केंचुए के छोटे-छोटे अंडे व बच्चे होते हैं उनसे जमीन में प्राकृतिक रूप से केंचुओं की संख्या बढ़ती है।

यदि घर अथवा खेत में थोड़ा-थोड़ा कचरा एकत्र होता है तब बायोडंग पद्धति के अथवा चार गड्ढे के चक्रीय तंत्र का प्रयोग करके भी अच्छा वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है।

यदि कचरे व स्थान की उपलब्धता अधिक हो व बड़ी मात्रा में कम्पोस्ट तैयार करना हो तब छायादार जगह में पहले बायोडंग बनाकर एक महीने बाद वर्मीबैड तैयार करके खाद बनाया जा सकता है। इस पद्धति से व्यावसायिक स्तर पर भी खाद बनाई जा सकता है।

वर्मीकम्पोस्ट में विभिन्न तत्वों की मात्रा


वर्मीकम्पोस्ट में साधारण मृदा की तुलना में 5 गुना अधिक नाइट्रोजन, 7 गुना अधिक फॉस्फेट, 7 गुना अधिक पोटाश, 2 गुना अधिक मैग्नीशियम व कैल्शियम होते हैं। प्रयोगशाला जाँच करने पर विभिन्न पोषक तत्वों की मात्रा इस प्रकार पाई जाती है-

नाइट्रोजन 1.0-2.25 प्रतिशतफास्फोरस 1.0-1.50 प्रतिशतनाइट्रोजन 2.5-3.00 प्रतिशत

वर्मीवाश बनाना


यह पत्तियों पर छिड़कने के लिये छिड़काव के रूप में तैयार किया जाता है। यह 10-25 लीटर धारण क्षमता वाली एक प्लास्टिक की बाल्टी अथवा मिट्टी का रंजन/मटका जिसमें टोटी लगी हो, उसमें बनाया जा सकता है। वर्मीवाश बनाने के लिये बाल्टी को निम्न प्रकार से भरा जाता है–

पहली परत -- 2”-3” ईंट व पत्थरदूसरी परत -- 2” रेत तीसरी परत -- 6” – 9” मिट्टी व पुराना कम्पोस्टचौथी परत -- 2” हरी घास, पत्तियाँ इत्यादिइस प्रकार बाल्टी भरकर उसमें 100 से 120 केंचुए छोड़ दिये जाते हैं। एक माह बाद इस बाल्टी के ऊपर एक छोटे मटके में पानी भरकर उसमें बारीक-बारीक छेद करके लटका दिया जाता है, जिसमें कपड़े की चिन्दियों के माध्यम से पानी रिसता रहता है। एक माह में केंचुए जो बाल्टी के ऊपर से नीचे की ओर बारीक-बारीक चालन करते हैं उनमें बारीक-बारीक रिक्तिकाएँ बाल्टी में भरे कम्पोस्ट में बन जाती है। ऊपर बँधे मटके में रिसता पानी से रिक्तिकाएँ बाल्टी में भरे कम्पोस्ट में बन जाती है। ऊपर बँधे मटके से रिसता पानी जब रिक्तिकाओं से गुजरता है तब उसमें केंचुए के शरीर से मूत्र एवं पसीने के रूप में छूटने वाला कोलाइडल द्रव्य मिल जाता है, जिसमें कई उपयोगी वृद्धिकारक हार्मोन्स एवं पोषक तत्व होते हैं। यह पानी बाल्टी के नीचे लगी टोंटी से 24 घंटे बाद खोलकर एकत्र कर लिया जाता है, इसे वर्मीवाश कहते हैं। यह कीट नियंत्रण में भी सहायक होता है।

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ


वर्मी कम्पोस्ट एक अच्छी किस्म की खाद है तथा साधारण कम्पोस्ट या गोबर की खाद से ज्यादा लाभदायक साबित हुई है। इसके प्रयोग करने में निम्नलिखित लाभ है–

1. वर्मी कम्पोस्ट को भूमि में बिखेरने से भूमि भुरभुरी एवं उपजाऊ बनती है। इससे पौधों की जड़ों के लिये उचित वातावरण बनता है। जिससे उनका अच्छा विकास होता है।
2. भूमि एक जैविक माध्यम है तथा इसमें अनेक जीवाणु होते हैं जो इसको जीवन्त बनाए रखते हैं इन जीवाणुओं को भोजन के रूप में कार्बन की आवश्यकता होती है। वर्मी कम्पोस्ट मृदा से कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता है तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरन्तरता प्रदान करता है।
3. वर्मी कम्पोस्ट में आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर व सन्तुलित मात्रा में होते हैं। जिससे पौधे सन्तुलित मात्रा में विभिन्न आवश्यक तत्व प्राप्त कर सकते हैं।
4. वर्मी कम्पोस्ट के प्रयोग से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है जिससे उसमें पोषक तत्व व जल संरक्षण की क्षमता बढ़ जाती है व हवा का आवागमन भी मिट्टी में ठीक रहता है।
5. वर्मी कम्पोस्ट क्योंकि कूड़ा-करकट, गोबर व फसल अवशेषों से तैयार किया जाता है अतः गन्दगी में कमी करता है तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखता है।
6. वर्मी कम्पोस्ट टिकाऊ खेती के लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है तथा यह जैविक खेती की दिशा में एक नया कदम है। इस प्रकार की प्रणाली प्राकृतिक प्रणाली और आधुनिक प्रणाली जो कि रासायनिक उर्वरकों पर आधारित है, के बीच समन्वय और सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।

उपयोग विधि


वर्मी कम्पोस्ट जैविक खाद का उपयोग विभिन्न फसलों में अलग-अलग मात्रा में किया जाता है। खेती की तैयारी के समय 2.5 से 3.0 टन प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए। खाद्यान्न फसलों में 5.0 से 6.0 टन प्रति हेक्टेयर मात्रा का उपयोग करें। फल वृक्षों में आवश्यकतानुसार 1.0 से 10 किग्रा./पौधा वर्मी कम्पोस्ट उपयोग करें तथा किचन, गार्डन और गमलों में 100 ग्राम प्रति गमला खाद का उपयोग करें तथा सब्जियों में 10-12 टन/हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करें।

हरी खाद


अपघटित दलहनी अथवा अदलहनी हरे पौधों या उनके भागों को जब भूमि की नाइट्रोजन अथवा जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो यही हरी खाद देना कहलाता है। यह क्रिया भूमि की संरचना के सुधार, जीवांश की मात्रा बढ़ाने तथा पोषक तत्व देने के लिये की जाती है। भूमि को इसी प्रकार उपजाऊ बनाने का कार्य भारतीय किसान यद्यपि प्राचीन काल से ही करते आ रहे हैं तथा भारत में हरी खाद के नियमित प्रयोग का प्रचार चाय और कॉफी के यूरोपीय मालिकों ने किया।

हरी खाद के महत्त्व


हरी खाद के बदले अधिक आय देने वाली किसी अन्य फसल को उगाने की चाहत से हरी खाद का प्रचलन कम हो गया है। साथ ही अच्छे किस्म के बीजों की अनुपलब्धता, सिंचाई जल का अभाव, श्रमिकों की कमी तथा कम समय इसके प्रचलन में मुख्य बाधाएँ हैं। हरी खाद के प्रयोग से 40-60 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की बचत की जा सकती है। आजकल हरी खाद की ओर अब फिर ध्यान आकृष्ट हुआ है जिसके फलस्वरूप भारत में लगभग 67 हजार हेक्टेयर जमीन पर हरी खाद उगाई जा रही है। सनई एवं ढैंचा भारत की सर्वाधिक प्रचलित खादें है तथा सेम, लोबिया और बरसीम आदि को भी कभी-कभी हरी खाद के रूप में प्रयोग करते हैं। हरी खाद मृदा की भौतिक दशा सुधार के साथ-साथ पोषक तत्व भी प्रदान करती है।

भारत में फसल अवशेषों और औद्योगिक अवशिष्टों जैसे धान का पुआल, गेहूँ का भूसा, धान का छिलका, गन्ने के अवशेष आलू के डंठल, अखाध सब्जियाँ, चाय, तम्बाकू तथा कपास अवशिष्ट, प्रेसमड, वन का कूड़ा-कचरा तथा जलकुम्भी आदि के कृषि में प्रयोग की बहुत सम्भावनाएँ हैं। कम नाइट्रोजन की मात्रा वाले फसल अवशेष जिनका कार्बन तथा नाइट्रोजन अनुपात विस्तृत होता है जैसे अनाजों तथा अन्य गैर दलहनी फसल अवशेषों को जमीन में मिलाने पर थोड़े समय के लिये घुलनशील नाइट्रोजन का स्थायीकरण हो जाता है। जिससे पौधों को नाइट्रोजन की उपलब्धता कम हो जाती है। यदि यही फसल अवशेष फसल की बुआई से तीन-चार सप्ताह पूर्व जमीन में मिला दिये जाएँ तो नाइट्रोजन स्थायीकरण की सम्भावना भी कम हो जाती है। अधिकतम पादप सुलभ नाइट्रोजन 25-30 दिन तक स्थायीकृत होते हैं। यदि इस समय को छोड़कर फसल की बुआई की जाये तो इस फसल के अलावा अगली फसल को भी फायदा होगा। परन्तु सघन कृषि क्षेत्रों में बहुफसलीय फसल चक्र में फसल अवशेषों को जमीन में मिलाने तथा सड़ाने के लिये दो फसलों के बीच शायद ही समय मिल पाता है। ट्रॉपीकल और सबट्रॉपीकल दशा में द्विफसलीय फसल चक्र में दो फसलों की बुआई के बीच एक-दो महीने का खाली समय मिल जाता है। यह समय उपलब्ध फसल अवशेषों को जमीन में मिलाने के लिये उपयुक्त होता है।

हरी खाद देने की विधियाँ


भूमि की किस्म तथा जलवायु की अवस्थाओं के अनुरूप भारत के विभिन्न प्रान्तों मे कितने ही तरीके हरी खाद के लिये अपनाए जाते हैं। हरी खाद मुख्यतः दो प्रकार से दी जाती है।

हरी खाद की सीटू विधि


इस विधि में हरी खाद की फसल उसी खेत में पैदा की जाती है तथा भूमि में दबाई जाती है जिसमे हरी खाद की फसल शुद्ध अथवा मिश्रित रूप से मुख्य फसल के साथ बोई जा सकती है। इस विधि में हरी खाद उन्हीं क्षेत्रों में दी जाती है जहाँ भूमि गहरी होती है तथा वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती है अथवा सिंचाई का कोई प्रबन्ध होता है। सीटू विधि से हरी खाद की सफलता तथा उससे आशातीत लाभ प्राप्त करने के लिये अधिक नमी की आवश्यकता पड़ती है।

यदि नमी का अभाव होगा तो फसल की बढ़वार और उसकी फिर भूमि में सड़न क्रिया नही हो सकती है। बिना सड़ी हुई खाद फसल को कोई लाभ नही पहुँचा सकती बल्कि उल्टा खेत में दीमक आदि बढ़ने का भय रहता है। सीटू पद्धति से हरी खाद देने के लिये सनई, ढैचा, ग्वार, उड़द, लोबिया, बरसीम, लूसर्न, सैजी आदि फसल का उपयोग किया जाता है।

हरी पत्ती की हरी खाद


वैसे तो यह पद्धति पर्याप्त वर्षा अथवा सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है। परन्तु उन क्षेत्रों में जहाँ भूमि उथली होती है अथवा भूमि में 10 से 15 सेमी. की गहराई पर कोई सख्त तह हो अथवा पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ भूमि बहुत पतली तह के रूप में होती है तथा न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से हरी खाद इस विधि से दी जाती है। इस विधि में पेड़ों तथा झाड़ियों के पत्ते तथा कोमल टहनियाँ लाकर खेत में दबाई जाती है। ये कोमल भाग भूमि में थोड़ी नमी होने पर सड़ जाते है।

हरी खाद की फसल का चुनाव


भूमि, जलवायु, नमी तथा उद्देश्य को ध्यान में रखकर निम्न विशेषताओं वाली फसलों का चुनाव करना चाहिए।

1. फसल शीघ्र उगने वाली हो। सनई, कोदोनीश, उड़द, मूँग व लोबिया आदि फसलों में शीघ्र वृद्धि करने का गुण होता है। शीघ्र वृद्धि करने वाली जातियों के बोने से फसल चक्र में आसानी से स्थापना हो जाती है अन्यथा अधिक समय लेने वाली हरी खाद की फसल से एक मुख्य फसल छोड़नी पड़ सकती है जिससे किसान को एस फसल का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
2. फसलों का डालपात मुलायम हो। मुलायम डालपात तथा रेशाविहिन फसलों का अपघटन शीघ्र होता है तथा ऐसी फसलों के अपघटन के लिये रेशेदार फसलों की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है। हरी खाद के लिये मुलायम एवं रेशाविहिन फसलों का, ऐसे क्षेत्रों मे जहाँ कम वर्षा या पानी का अभाव हो, विशेष महत्त्व की है। जैसे लोबिया, उड़द, मोठ, कुल्थी, कदोजीरा, बरसीम, मुलायम डालपात वाली हरी खाद की फसलें है।
3. फसलों में अधिक शाखा व पत्ती हो। इससे भूमि में अधिक नाइट्रोजन मिलाई जा सकती है। अधिक डालपात वाली फसल का अपघटन भी जल्दी हो जाता है। ढैचा, वाकुची, लोबिया, कुदूजवाइन इस शर्त पर पूर्ति करने वाली फसलें है।
4. फसलों की जड़ें काफी गहरी हो। गहरी जड़ों वाली फसलें भूमि के नीचे तक घुसकर उसे भुरभुरा बना देती है तथा भूमि की निचली तह में उपस्थित भोजन तत्वों का उपयोग कर लेती है, जो बाद में हरी खाद के रूप में उपरी सतह में ही आ जाती है। यह बात भारी तथा बलुई किस्म की मिट्टियों में विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि हल्की भूमियों में घुलनशील तत्व नीचे चले जाते हैं तथा भारी भूमियों में जल निक्षालन तथा रिसाव बहुत कम होता है। सनई, ढैचा दोनों ही गहरी जड़ों वाली फसलें हैं।
5. बाजरा, ज्वार, मक्का आदि को जो दलहनी फसलें नहीं है फिर भी हरी खाद के लिये प्रयोग में किया जा सकता है। लेकिन अच्छा यही रहता है कि हरी खाद के रूप में किसी दाल वाली फसल को ही प्रयुक्त किया जाये। दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रंथियाँ होती है। जिनमें उपस्थित अणुजीव राइजोबियम वायुमण्डल से नाइट्रोजन को भूमि में संचय एवं स्थिर करने की क्षमता रखते हैं।
6. हरी खाद के लिये फसलें सूखा अवरोधी रोग व कीट अवरोधी प्रचुर मात्रा में बीज पैदा करने वाली, अधिक वर्षा आदि से उत्पन्न होने वाली दशाओं को सहन करने वाली होनी चाहिए।
7. हरी खाद के लिये ऐसी फसलों का चुनाव किया जाये जो कृषकों के लिये सस्ती हो तथा दूसरी प्रयोग में भी प्रयुक्त होती हो। उदाहरण के लिये सनई की फसल खाद, रेशे, बीज, चारा आदि के उपयोग की है।

हरी खाद के लाभ


1. भूमि को जीवांश मिलता है जिससे लाभकारी जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ती है।
2. हरी खाद के पौधों द्वारा भूमि की गहरी सतह से लिये गए पोषक तत्व भूमि की ऊपरी सतह में आ जाते हैं।
3. इससे भूमि की संरचना में सुधार होता है।
4. भूमि में जल शोषण व धारण शक्ति बढ़ती है जिससे भूमि कटाव रोकने में सहायता मिलती है।
5. गहरी खाद के लिये जब दलहनी फसलें उगाई जाती हैं तो उनके द्वारा वायुमंडल से स्वतंत्र नाइट्रोजन भूमि में इकट्ठी हो जाती है।
6. कुछ अनुपलब्ध तत्व जैसे फॉस्फोरस, कैल्शियम, पोटाश, मैग्नीशियम तथा लोहा आदि पोषक तत्वों की उपलब्धि बढ़ जाती है।
7. खरपतवार नियंत्रित होते है।
8. क्षारीय एवं लवणीयता वाली भूमियों में सुधार होता है।
9. मृदा संरचना में सुधार होता है।
10. फसलों के उत्पादन में वृद्धि होती है।

हरी खाद देने के सम्बन्ध में कुछ सुझाव


1. जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हो वहाँ पर यदि समय पर वर्षा न हो तो सिंचाई करके हरी खाद की फसल बोयी जा सकती है यदि सिंचाई के साधनों का अभाव हो तो पहली वर्षा होते ही खेत जोतकर बीज की बुआई कर देनी चाहिए।

2. जिन खेतों में हरी खाद की फसल बोयी जाती हो वहाँ यह बात सुनिश्चित कर लेनी चाहिए कि आगामी फसल तब बोयी जाये जब हरी खाद की फसल पूर्ण रूप से सड़ चुकी हो। यदि हरी खाद आगामी फसल के लिये अस्थायी रूप से प्राप्त नाइट्रोजन की मात्रा में ह्रास हो सकता है। जिसका मुख्य फसल की प्रारम्भिक वृद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। वैज्ञानिकों का मत यह है कि ऐसी दशा में बाद का सड़ाव करने वाले बैक्टीरिया खेत में उपस्थित प्राप्त नाइट्रोजन को खा जाते हैं।

3. गैर दलहनी हरी खाद की फसलों में नाइट्रोजनीय खाद आवश्यकता के अनुसार प्रयोग करना चाहिए जबकि दाल वाली फसलों में 2 में 4 क्विंटल सुपरफास्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। सुपरफास्फेट के प्रयोग से दाल वाली फसलों को बड़ा लाभ पहुँचता है। इसके लिये प्रयोग से इन फसलों की जड़ों में उपस्थित ग्रन्थियाँ अधिक संख्या में बनती है और उनका आकार भी बड़ा होता है। जिसके फलस्वरूप भूमि में अधिक नाइट्रोजन स्थिर होती है। प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि मुख्य फसल को सुपर फॉस्फेट देने से जितना लाभ होता है उससे कहीं अधिक लाभ तब होता है जब सुपरफॉस्फेट हरी खाद की फसल में दिया जाता है।

4. हरी खाद का समुचित लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उसकी वृद्धि तथा सड़ाव के लिये प्रयाप्त नमी खेत में हो। जिन क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में 100 से 150 सेमी. वर्षा हो जाती है। वहीं हरी खाद की सभी फसलें बिना सिंचाई के पैदा की जा सकती है। इसके विरुद्ध 50 से 60 सेमी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा के बिना हरी खाद नहीं होनी चाहिए। प्रयाप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में कभी-कभी लम्बी अवधि तक सूखा पड़ जाता है ऐसी स्थिति में फसल की वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिये या अगर फसल खेत मे दबी पड़ी हो तो उसके अपघटन को सुचारू रुप से चलाने के लिये सिंचाई करनी आवश्यक होती है। जिस हरी खाद में उर्वरकों का प्रयोग किया गया हो, उनमें तो नमी का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

5. हरी खाद को मिट्टी पलटने वाले लोहिया हल से मिट्टी की मोटी तह से अच्छी तरह दबा देना चाहिए। समान रूप से विघटन के लिये यह आवश्यक है कि जड़ों के पास पत्तियों तथा शाखाओं को दबाया जाये। शुष्क क्षेत्रों में हरी खाद की छोटी अवस्था में ही जब काफी कोमल हो दबा देना चाहिए। पर्याप्त वर्षा वाले अथवा सिंचित इलाकों में फसल को तब दबाना चाहिए जब उसमें सबसे अधिक कार्बनिक पदार्थ हो हर दशा मे यह फसल मुख्य फसल की बुआई से एक से डेढ महीने पहले आवश्यक रूप से खेत में जोत देनी चाहिए।

हरी खाद की खेती


1. जलवायु - फसल एवं उत्तम हरी खाद के लिये नम जलवायु का होना आवश्यक है। फसलों की वृद्धि व विच्छेदन के लिये कम-से-कम 60 सेमी. वर्षा का होना आवश्यक है।

2. भूमि का चुनाव - चिकनी व लवणीय भूमि के लिये ढैचा, बरसीम व बलुई व कम उर्वरकता वाली भूमियों के लिये सनई, मूँग, उदड़, ज्वार आदि उपयुक्त फसलें रहती हैं।

3. भूमि की तैयारी - हरी खाद की फसलों को बोने हेतु खेती की विशेष तैयारी की आवश्यकता होती है। आवश्यकता होने पर 1 या 2 जुताई कर खेत तैयार किया जा सकता है।

4. बोनी का समय - खरीफ फसलें जैसे सनई, ढैचा, उड़द, लोबिया, ज्वार, मूँग आदि को वर्षा आरम्भ होते ही बोनी की जाती है जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं वहाँ पर रबी की फसलों को काट कर अप्रैल, मई, जून में खेत का पलेवा करके हरी खाद की फसलों की बुआई कर सकते है। रबी की फसले मटर, बरसीम, मेथी आदि को अक्टूबर मसूर आदि को दिसम्बर तक व मेथी, सैजी की बुआई जनवरी तक अन्य फसलों की कटाई करने के बाद करते हैं।

5. बीज दर - हरी खाद के लिये बोयी जाने पर प्रति इकाई क्षेत्र अधिक बीज बोया जाता है जैसे सनई 40, ढैचा 30, ज्वार 20, लोबिया 50, मटर 100, सैजी 30, मूँग व उड़द 30 व बरसीम की बीज 20 कि.ग्रा./हे. की दर से उपयोग किया जाता है।

6. सिंचाई - जहाँ पर सिंचाई उपलब्ध हो वहाँ पर फसल की आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।

7. फसल पलटाई का समय - फसल की विशेष अवस्था पन पलटाई करने से भूमि की सबसे अधिक नत्रजन व जीवांश पदार्थ प्राप्त होता है। इस अवस्था के पूर्व या बाद में पलटाई करना लाभदायक नहीं होता है। यह विशेष अवस्था में हो और फसल में फूल निकलने प्रारम्भ हो गए हों इस समय पर वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है तथा पौधों की शाखाएँ व पत्तियाँ मुलायम होती हैं। इस अवस्था में कार्बन नत्रजन अनुपात भी कम होता है। सनई की फसल में 50 दिन बाद ढैचा, 40 दिन बाद यह अवस्था आती है। बरसीम आदि की फसलों से 2-3 कटाई के पश्चात फसल की खेती में दबा सकते हैं।
October 08, 2018

My Story

मै गया ज़िला के डोभी ब्लॉक के केशापी गॉंव के एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ. हमारे पास 5 एकड़ जमीन थी जिससे प्रारम्भ में खेती कर के किसी तरह अपने संयुक्त परिवार का भरण पोषण करते थे. खेत से जो भी आमदनी होती थी उससे अपने संयुक्त परिवार का भरण पोषण बहुत मुश्किल से होता था . इसी क्रम में कुछ पैसे कमाने के ललक में ट्रक चालक के रूप में पंजाब , हरियाणा ,उतर प्रदेश इत्यादि जगहों पर गये तथा वहां पर कृषि कार्यों को देखा उन्ही स्थानों से प्रेरणा पाकर कृषि के प्रति रूचि लेते हुए सब्जी लगाना प्रारंभ किया |


इससे मेरी आय धीरे धीरे बढ़ने लगी | इसके बाद ये बागवानी की ओर भी इनका ध्यान गया तथा १ एकड़ में आम के पौधों को लगाया |इसके बाद कृषि कार्य में पूरी रूचि होने के कारन जिला कृषि कार्यालय,आत्मा तथा उद्यान कार्यालय के संपर्क में आये |कृषि विभाग तथा आत्मा के द्वारा इन्हें प्रशिक्षण हेतु पंतनगर,पूषा,झाँसी इत्यादी स्थानों पर भेजा गया |इसके बाद उपरोक्त स्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त कर कृषि में पूर्ण रूप से परिवार सहित लग गये |आज मेरे द्वारा अपनी भूमि का एक-एक इंच को कृषि कार्य हेतु उपयोग किया जा रहा है| इनके पास गोबर गैस प्लांट, वर्मी कम्पोस्ट इकाई उपलब्ध है| साथ ही साथ आम का बहुत बड़ा बगीचा है इनके पास उन्नत कृषि यन्त्र पावर टिलर, नेपसेक, पावर स्प्रेयर इत्यादी उपलब्ध है |
इनके द्वारा वर्मी कम्पोस्ट का भी उत्पादन किया जा रहा है | कृषि विभाग के परामर्श से समेकित कृषि प्रणाली को अपनाया गया है | इनका रुझान अब मशरूम उत्पादन की ओर है | इस प्रकार मुश्किल से जीवन यापन करने वाला सलाना 50-60 हजार रूपये प्रति एकड़ का मुनाफा कमा रहे है | कृषि के क्षेत्र में ये इतनी जानकारी प्राप्त कर चुके हैं की आत्मा के सहयोग से किसान प्रक्षेत्र पाठशाला का संचालन भी इनके द्वारा किया जा रहा है| इस तरह इनका जीवन स्तर कृषि को अपनाकर काफी सुखी है तथा भविष्य में कृषि क्षेत्र में काफी कुछ करने की तमन्ना हैं|
हमारे द्वारा अपनाई गयी समेकित कृषि प्रणाली को देखने के लिए माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केशापी गये और उनके खेतो का भ्रमण किये| इशी दौरान माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने लिखा की

माननीय मुख्यमंत्री के निर्देश पर 23 फ़रवरी को कृषि उत्पादन आयुक्त, प्रधान सचिव पशूपालन,मत्स्य एवं सहकारिता, प्रधान सचिव योजना वो.स.डी. पंचायती राज के साथ-साथ जिला पदाधिकारी, निदेशक बामेती एवं स्थानीय पदाधिकारी ने इनके द्वारा अपनाई जा रही कृषि तकनीकों को देखा एवं सराहा |



October 08, 2018

2.5 एकड़ जमीन से दस-बारह लाख रु. की सालाना आमदनी!

जैविक आधार पर की जाने वाली बहुआयामी खेती में ही मेरी सफलता का राज छिपा है। किस मौसम में कौन सी फसल की खेती करनी है, यह तय करने के पहले मैं जमीन की गुणवत्ता और पानी की उपलब्धता के साथ-साथ बाजार की मांग को भी हमेशा ध्यान में रखता हूं। मैं जिस तरह से खेती करता हूं, उसके कुछ खास पहलू इस प्रकार हैं :

केंचुआ खाद :

केंचुआ किसान के सबसे अच्छे मित्रें में से एक है। मैं अपने खेतों में केंचुआ खाद का खूब प्रयोग करता हूं। एक किलो केंचुआ वर्ष भर में 50-60 किलो केंचुआ पैदा कर सकता है। केंचुआ खाद बनाने में खेती के सारे बेकार पदार्थों, जैसे डंठल, सड़ी घास, भूसा, गोबर, चारा आदि का प्रयोग हो जाता है। सब मिलाकर केंचुए से 60-70 दिनों में खाद तैयार हो जाती है। इस खाद की प्रति एकड़ खपत यूरिया की अपेक्षा एक चौथाई है। इसके प्रयोग से मिट्टी को नुकसान भी नहीं पहुंचता है। फसल की उत्पादकता भी 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केंचुआ खाद बनाने पर यदि किसान ध्यान दें तो वे अपने खेतों में प्रयोग करने के बाद इसे बेच भी सकते हैं। यह किसान भाईयों के लिए आमदनी का एक अतिरिक्त स्रोत भी हो सकता है।

बायो गैस :

मैं बायोगैस का इतना अधिक उत्पादन कर लेता हूं कि इससे इंजन चलाने और अन्य जरूरतें पूरी करने के बाद भी गैस बच जाती है। बची हुई गैस मैं अपने मजदूरों में बांट देता हूं। इससे उनके भी ईंधन का काम चल जाता है। बायोगैस का मैंने एक परिवर्तित माडल तैयार किया है जिसमें प्रति घन मीटर की लागत 5000 रुपए की बजाय 1000 रफपए हो जाती है। मेरे इस माडल में गैस पलांट की मरम्मत का खर्चा भी न के बराबर है।


मशरूम खेती :

मैं मशरूम की कई फसलें लेता हूं। जिन किसान भाइयों के यहां मार्केट नजदीक नहीं है, उन्हें डिंगरी (ड्राई मशरूम) की फसल लेनी चाहिए। आज पूरी दुनिया में डिंगरी का 80 हजार करोड़ का बाजार है। जहां धान की फसल होती है, वहां इसकी खेती की संभावनाएं सबसे अधिक होती हैं क्योंकि इसकी खेती में पुआल का विशेष रूप से प्रयोग होता है। फसल लेने के बाद बेकार बचे हुए पदार्थों को मैं केंचुआ खाद में बदल कर 60-70 दिनों में वापस खेतों में पहुंचा देता हूं।

तालाब एवं मछली पालन :

खेत के सबसे नीचे कोने को और गहरा करके मैंने तालाब बना दिया है, जिसमें बरसात का सारा पानी इकट्ठा होता है और डेरी का सारा व्यर्थ पानी भी चला जाता है। डेरी के पानी में मिला गोबर आदि मछलियों का भोजन बन जाता है। इससे उनका विकास दोगुना हो जाता है। मछलीपालन के अलावा तालाब में कमल ककड़ी, मखाना आदि भी उगाता हूं।

बहुफसलीय खेती :

मैं एक साथ तीन से चार फसल लेता हूं। ऐसा करते समय मैं समय, तापमान और मेल का विशेष ध्यान रखता हूं। उदाहरण स्वरूप सितंबर माह के अंत में मूली की बुवाई हो जाती है जिसके साथ गेंदा फूल भी लगा देते हैं। मूली को अक्टूबर में निकाल लेते हैं और नवंबर के शुरूआत में पालक या तोरी आदि लगा देते हैं जिसकी कटाई दिसंबर में हो जाती है। वहीं फूलों से आमदनी जनवरी से शुरू हो जाती है।

गुलाब एवं स्टीवीया :

स्टीवीया एक छोटा सा पौधा है जिससे निकलने वाला रस चीनी से 300 गुना ज्यादा मीठा होता है। इसका प्रयोग मधुमेह के मरीज भी कर सकते हैं। मैंने इसकी खेती से प्रति एकड़ लाखों रुपए की कमाई की है। एक विशेष प्रकार के महारानी प्रजाति के गुलाब की खेती से भी मैंने काफी लाभ कमाया है। इस गुलाब से निकलने वाले तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 4 लाख रुपए प्रति लीटर है। एक एकड़ में उत्पादित गुलाब से लगभग 800 ग्राम तेल निकाला जा सकता है।

केले की खेती :

केले की खेती से जमीन में केंचुओं की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है। केला एक ऐसा पौधा है जो खराब एवं पथरीली जमीन को भी कोमल मिट्टी में तब्दील कर देता है। इसके प्रभाव से किसी भी फसल की उत्पादकता 25 से 30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केले की जैविक खेती करने से पौधे सामान्य से ज्यादा ऊंचाई के होते हैं। इसकी खेती से लगभग 25 से 30 हजार रुपए प्रति एकड़ की आमदनी हो जाती है। गर्मी में केलों के बीच में ठंडक रहती है इसलिए इसमें फूलों की भी खेती हो जाती है, जिससे 15-20 हजार रुपए की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। गर्मी के दिनों में मधुमक्खी के बक्सों को रखने के लिए भी यह सबसे सुरक्षित स्थान होता है।

वृक्षारोपण :

खेतों की मेड़ों पर मैंने पापुलर आदि के पेड़ लगा रखे हैं जिससे 7 से 8 वर्षों में प्रति एकड़ 70 से 80 हजार रुपए की आमदनी हो जाती है। इन वृक्षों से खेतों को नुकसान भी नहीं होता और पर्यावरण भी ठीक रहता है।

मधुमक्खी पालन :

मधुमक्खी से भरे एक बक्से की कीमत लगभग चार हजार रुपए होती है। मेरी खेती में मधुमक्खियों की विशेष भूमिका है। वैसे भूमिहीन किसान भाइयों के लिए भी मधुमक्खी पालन एक अच्छा काम है। शहद उत्पादन के अलावा भी इनके कई फायदे हैं। फूलों की पैदावार में इनसे 30 से 40 प्रतिशत और तिलहन-दलहन की पैदावार में लगभग 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है। बेहतर परागण के कारण फसलें भी एक ही समय पर पकती हैं। इस क्षेत्र में खादी ग्रामोद्योग एवं कई अन्य संस्थाएं सहायता कर रही हैं।


किसान भाइयों के लिए संदेश 


समझदार किसान तो वो है जो पहले मार्केट देखे, फिर मिट्टी की जांच कराए, तापमान का ख्याल रखे और अच्छे बीज का चयन करे। किसान भाइयों को जैविक खेती ही करनी चाहिए, मवेशी रखनी चाहिए, बायोगैस तथा वर्मी कम्पोस्ट तैयार करना चाहिए। 365 दिन में 300 दिन कैसे काम करें, प्रत्येक किसान को इसकी चिन्ता करनी चाहिए। हमें एक-दो फसलें ही नहीं बल्कि एक-दूसरे पर आश्रित खेती की बहुआयामी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। इस संबंध में किसी प्रकार की जानकारी के लिए किसान मुझसे जब चाहें संपर्क कर सकते हैं।
October 08, 2018

खेती कैसे करे – खेती करके आप कितने पैसे कम सकते है ?

खेती में सफल हुवे किसानो से अगर आप पूछते है की खेती कैसे करे और आप खेती करना चाहते है तो वो आपको कहेंगे खेती से अच्छा काम और कोई नहीं लेकिन अगर आप खेती करके पैसा कमाने की सोच रहे है तो आपके मन में एक सवाल होगा की खेती करके आप कितना पैसा कमा सकते है और सोचना भी चाहिए आखिर सभी लोग पैसे के लिए ही तो काम कर रहे है कोई भी फ्री में कोई काम नहीं करता है अगर आपके पास अच्छा खेत है और आप खेती करने के लिए सोच रहे है तो आपको सबसे पहले कुछ खेती के बारे में सीखना होगा की खेती कैसे करते है और आपकी खेती जिस जगह पे है वहां पे आप किस तरह की खेती कर सकते है अगर हम मान के चलते है की हमने गेहू की खेती करना चाहते है तो हमें सबसे पहले पता करना होगा की हम जहा पे खेती करना चाहते है उसमे सिचाई का कितना खर्चा आएगा और बीज का खर्चा कितना आएगा खाद का कितना पैसा होगा जुताई का कितना पैसा लगेगा वैगेरह वगैरह सब कुछ का हिसाब पहले ही लगाना होगा और उसकी उपज कितनी होगी ये सब जानकारी अगर आप नहीं रख पाते है तो आपको हो सकता है नुकशान का भी सामना करना पड़े


खेती बड़ी के बारे में सुझाव ?

मैं आपको सुझाव दूंगा की आप खेती की सुरुवात छोटे से करे मान लीजिये आपके पास 1 एकड खेत है तो आप उसमे से आधा करे या आधा से भी कम ताकि आपको सही से पता चले की आप उसमे कितना पैसा कमा पाए है या नुकसान हुवा है अगर आप सफल होते है तो आप बड़ी मात्र में खेती करे आप खेती बड़ी की अच्छी सुझाव के लिए कृषि या फिर फ़ोन करके भी बात कर सकते है 
अगर आप छोटे किसान है और आप पैसे कमाने के लिए सोच रहे है तो आप बहुत ही आसानी से कमा  सकते है वैसे आप अगर सब्जी की खेती करते है तो सब्जी में भी अच्छे पैसे मिल जाते है मैं आपको खेती के बारे में कुछ टिप्स देना चाहूँगा 
टिप्स १-  खेती के लिए अच्छे बीज का चुनाव बहुत ही जरुरी होता है बीज का चुनाव के लिए आपको अच्छी कंपनी का बीज ही चुनाव करना चाहिए क्यूंकि बहुत सारे आइसे बीज होते है जिसके पौधे बहुत ही बड़े होते है लेकिन फल बहुत ही कम आते है लेकिन हमारे खाद और सिचाई का खर्चा भी उतना ही लग जाता है और हमें नुकसान होने लगते है इसलिए हमेशा भरेशेमंद दुकान से अच्छे बीज की बुवाई करे अगर आप अच्छे बीज का चुनाव करते है तो उसके पौधे छोटे होते है लेकिन उसमे फल ज्यादा आते है और उससे हमें काफी फायेदा होता है 
टिप्स 2 - अगर आप खेती कर रहे है तो फसल से कभी भी लापरवाही न करे क्यूंकि फसल को सही समय पर सिचाई और खाद नहीं दिया जाता है तो खेत के सारे फसल बर्बाद हो जाते है उसमे बहुत सारी बिमारिय लग जाती है और बाद में कितना भी दावा का छिडकाव से वो जल्दी अच्छे नहीं होते इसलिए समय पर उसकी खाद और और सिचाई खरपतवार का ख्याल रहे 
टिप्स 3 –  खेत में ज्यादा पानी न लगाये आपकी फसल को जितनी सिचाई की जरुरत हो उतना ही सिचाई करे और उतना ही खाद डाले बहुत सारे फसल सिर्फ इसलिए ख़राब हो जाते है जिसमे बहुत सिचाई और दवा का प्रयोग होता है फसल में बीमारी आती है या आने वाली है तभी दवा का इस्तेमाल करे जैसे इन्सान को जरुरत से ज्यादा खाना खाने से तबियत ख़राब हो जाती है वैसे ही फसल में अगर ज्यादा खाद और पानी देने पे फसल भी ख़राब हो जाते है जितनी जरुरी चीजे है उतनी ही करे 
टिप्स 4 – खेती करना बहुत आसान काम नहीं है इसमें कभी कभी बहुत घाटा भी होता है लेकिन अच्छा पैसा वही कमा  सीजन से पहले सब्जी ऊगा ले बाजार में जिसकी सब्जी सबसे पहले आती है तब उसका कीमत अच्छा होता है लेकिन अगर सभी लोगो के सब्जी बाजार  आते है तो उसकी कीमत घट जाती है सबसे जरुरी है समय से थोड़ा पहले बुवाई करे ताकी आपकी फसल अच्छी कीमत में बिक सके
बहुत बार समय से पहले बुवाई करने पर हमारी बीज अंकुरित नहीं हो पाती है उसके लिए हमें थोड़ी जानकारी लेनी चाहिए की हमारी बीज हम समय से पहले कैसे अंकुरित कर सकते है 
 अगर आपका कोई भी सवाल है तो हमें कांटेक्ट करे या हमें कमेंट बॉक्स में बताये या आप हमें whatsapp पर भी मेसेज कर सकते है 

Tuesday, 7 August 2018

August 07, 2018

टमाटर की खेती

आदर्श तापमान

टमाटर की फसल पाला नहीं सहन कर सकती है। इसकी खेती हेतु आदर्श तापमान 18. से 27 डिग्री से.ग्रे. है। 21-24 डिग्री से.ग्रे तापक्रम पर टमाटर में लाल रंग सबसे अच्छा विकसित होता है। इन्हीं सब कारणों से सर्दियों में फल मीठे और गहरे लाल रंग के होते हैं। तापमान 38 डिग्री से.ग्रे से अधिक होने पर अपरिपक्व फल एवं फूल गिर जाते हैं।

भूमि

उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि जिसमे पर्याप्त मात्रा मे जीवांश उपलब्ध हो।


टमाटर की किस्में

देसी किस्म-पूसा रूबी, पूसा-120,पूसा शीतल,पूसा गौरव,अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली
संकर किस्म-पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड-4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस.440 आदि।

बीज की मात्रा और बुवाई

बीजदर
एक हेक्टयेर क्षेत्र में फसल उगाने के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु लगभग 350 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। संकर किस्मों के लिए बीज की मात्रा 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है।
बुवाई
वर्षा ऋतु के लिये जून-जुलाई तथा शीत ऋतु के लिये जनवरी-फरवरी। फसल पाले रहित क्षेत्रों में उगायी जानी चाहिए या इसकी पाल से समुचित रक्षा करनी चाहिए।

बीज उपचार

बुवाई पूर्व थाइरम/मेटालाक्सिल से बीजोपचार करें ताकि अंकुरण पूर्व फफून्द का आक्रमण रोका जा सके।

नर्सरी एवं रोपाई

  • नर्सरी मे बुवाई हेतु 1X 3 मी. की ऊठी हुई क्यारियां बनाकर फॉर्मल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन कर लें अथवा कार्बोफ्यूरान 30 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मिलावें।
  • बीजों को बीज कार्बेन्डाजिम/ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर 5 से.मी. की दूरी रखते हुये कतारों में बीजों की बुवाई करें। बीज बोने के बाद गोबर की खाद या मिट्‌टी ढक दें और हजारे से छिड़काव -बीज उगने के बाद डायथेन एम-45/मेटालाक्सिल से छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
  • 25 से 30 दिन का रोपा खेतों में रोपाई से पूर्व कार्बेन्डिजिम या ट्राईटोडर्मा के घोल में पौधों की जड़ों को 20-25 मिनट उपचारित करने के बाद ही पौधों की रोपाई करें। पौध को उचित खेत में 75 से.मी. की कतार की दूरी रखते हुये 60 से.मी के फासले पर पौधों की रोपाई करें।
  • मेड़ों पर चारों तरफ गेंदा की रोपाई करें। फूल खिलने की अवस्था में फल भेदक कीट टमाटर की फसल में कम जबकि गेदें की फलियों/फूलों में अधिक अंडा देते हैं।

उर्वरक का प्रयोग

20 से 25 मैट्रिक टन गोबर की खाद एवं 200 किलो नत्रजन,100 किलो फॉस्फोरस व 100किलो पोटाश। बोरेक्स की कमी हो वहॉ बोरेक्स 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करने से फल अधिक लगते हैं।

सिंचाई

सर्दियों में 10-15 दिन के अन्तराल से एवं गर्मियों में 6-7 दिन के अन्तराल से हल्का पानी देते रहें। अगर संभव हो सके तो कृषकों को सिंचाई ड्रिप इर्रीगेशन द्वारा करनी चाहिए।

मिट्‌टी चढ़ाना व पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)

टमाटर मे फूल आने के समय पौधों में मिट्‌टी चढ़ाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है। टमाटर की लम्बी बढ़ने वाली किस्मों को विशेष रूप से सहारा देने की आवश्यकता होती है। पौधों को सहारा देने से फल मिट्‌टी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सड़ने की समस्या नही होती है। सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद बांस या लकड़ी के डंडों में विभिन्न ऊॅचाईयों पर छेद करके तार बांधकर फिर पौधों को तारों से सुतली बांधते हैं। इस प्रक्रिया को स्टेकिंग कहा जाता है।

खरपतवार नियंत्रण

  • आवश्यकतानुसार फसलों की निराई-गुड़ाई करें। फूल और फल बनने की अवस्था मे निंदाई-गुड़ाई नही करनी चाहिए।
  • रासायनिक दवा के रूप मे खेत तैयार करते समय फ्लूक्लोरेलिन (बासालिन) या से रोपाई के 7 दिन के अंदर पेन्डीमिथेलिन छिड़काव करें।

प्रमुख कीट एवं रोग

प्रमुख कीट- हरा तैला, सफेद मक्खी, फल छेदक कीट एंव तम्बाकू की इल्ली
प्रमुख रोग-आर्द्र गलन या डैम्पिंग ऑफ, झुलसा या ब्लाइट, फल संडन

एकीकृत कीट एवं रोग नियंत्रण

  • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
  • पौधशाला की क्यारियॉ भूमि धरातल से ऊंची रखे एवं फोर्मेल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन करलें।
  • क्यारियों को मार्च अप्रैल माह मे पॉलीथीन शीट से ढके भू-तपन के लिए मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  • गोबर की खाद मे ट्राइकोडर्मा मिलाकर क्यारी में मिट्‌टी में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।
  • पौधशाला की मिट्‌टी को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से बुवाई के 2-3 सप्ताह बाद छिड़काव करें।
  • पौध रोपण के समय पौध की जड़ों को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल मे 10 मिनट तक डुबो कर रखें।
  • पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल पर चेपा, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के लिए 2 से ३ छिड़काव इमीडाक्लोप्रिड या एसीफेट के करें। माइट की उपस्थिति होने पर ओमाइट का छिड़काव करें।
  • फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली के लिए इन्डोक्साकार्ब या प्रोफेनोफॉस का छिड़काव ब्याधि के उपचार के लिए बीजोपचार, कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब से करना चाहिए। खड़ी फसल मेंं रोग के लक्षण पाये जाने पर मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब या ब्लाईटॉक्स का धोल बनाकर छिड़काव करें। चूर्णी फंफूद होने सल्फर धोल का छिड़काव करें।

फलों की तुड़ाई,उपज एवं विपणन

जब फलों का रंग हल्का लाल होना शुरू हो उस अवस्था मे फलों की तुड़ाई करें तथा फलों की ग्रेडिंग कर कीट व व्याधि ग्रस्त फलों दागी फलों छोटे आकार के फलों को छाटकर अलग करें। ग्रेडिंग किये फलों को केरैटे में भरकर अपने निकटतम सब्जी मण्डी या जिस मण्डी मे अच्छा टमाटर का भाव हो वहां ले जाकर बेचें। टमाटर की औसत उपज 400-500 क्विंटल/है. होती है तथा संकर टमाटर की उपज 700-800 क्विंटल/है. तक हो सकती है।
टमाटर की प्रति हेक्टेयर कृषि लागत व्यय (रुपये में)
क्र.
विवरण
मात्रा एवं दर प्रति इकाई
लागत (रु.)
1.
क.
ख.
भूमि की तैयारी
जुताई की संख्या
मजदूरों की संख्या
02, दर 500/- प्रति घंटा
06, दर 150/-
1000
900
2.
स.
ख.
खाद एवं उर्वरक
गोबर की खाद 10 टन, 2 वर्ष में एक बार
नत्रजन
फास्फोरस
पोटाश
(मृदा परीक्षण के अनुसार) मजदूरों की संख्या
1000/-प्रति टन,
200 किलोग्राम दर 12.40/-
100 किलोग्राम दर 32.70/-
100 किलोग्राम दर 19.88/-
20, दर 150/-
10000
2480
3270
1988
3000
3.
क.
पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)
बॉस एवं वायर
मजदूरों की संख्या
50, दर 150/-
31000
7500
4.क.
बीज की मात्रा
बुआई पर
मजदूरों की संख्या
200 ग्राम दर 400/10 ग्राम
15, दर 150/-
8000
2250
5.क.
सिंचाई संख्या
मजदूर
10
10 दर 150/-
5000
1500
6.
निंदाई
मजदूरों की संख्या
40 दर 150/-
6000
7.
फसल सुरक्षा
ट्रायजोफॉस
इमीडाक्लोप्रिड
एसीफेट
प्रोफेनोफॉस
मजदूरों की संख्या
2 बार, दर 450/-
2 बार, दर 200/-
2 बार, दर 160/-
2 बार, दर 500/-
16 दर 150/-
900
400
320
1000
2400
तुड़ाई (मजदूरों की संख्या)
40 दर 150/-
6000
कुल लागत
88158
कुल आय (औसतन पैदावार 600 क्विंटल प्रति हेक्टयर)
480000
शुद्ध लाभ
391842